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Bihar Politics: गिरिधारी यादव की सांसदी पर संकट? नोटिस के बाद भी खतरा कम क्यों

पटना। बांका से सांसद Giridhari Yadav की लोकसभा सदस्यता को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। Janata Dal United (JDU) द्वारा लोकसभा स्पीकर को नोटिस दिए जाने के बाद उनकी सांसदी पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि फिलहाल उनकी सदस्यता पर कोई बड़ा खतरा नहीं है।

क्यों मुश्किल है सदस्यता रद्द होना?

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी सांसद की सदस्यता खत्म करना आसान नहीं होता। इसके लिए संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) लागू होती है।

इस कानून के तहत सदस्यता केवल दो स्थितियों में खत्म हो सकती है:

  • यदि सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ दे
  • यदि वह पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट करे

अंतिम निर्णय Lok Sabha Speaker के पास होता है, लेकिन वह भी नियमों से बंधे होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं?

Supreme Court of India ने भी इस मुद्दे पर साफ रुख अपनाया है।

जी. विश्वनाथन केस और अमर सिंह केस में कोर्ट ने कहा: यदि किसी सांसद को पार्टी से निकाल भी दिया जाए, तब भी वह मूल पार्टी का सदस्य माना जाएगा जब तक वह किसी अन्य दल में शामिल न हो

ऐसे मामलों में सांसद अनअटैच्ड सदस्य के रूप में बने रहते हैं।

विवाद की वजह क्या है?

गिरिधारी यादव के बेटे ने 2025 विधानसभा चुनाव में Rashtriya Janata Dal (RJD) के टिकट पर चुनाव लड़ा था।

JDU ने इसे अनुशासनहीनता का मुद्दा बनाते हुए कार्रवाई की मांग की है।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले

यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी JDU नेताओं के परिजनों ने दूसरे दल से चुनाव लड़ा है:

  • महेश्वर हजारी के बेटे सन्नी हजारी – कांग्रेस से
  • अशोक चौधरी की बेटी शाम्भवी चौधरी – LJP(R) से

इसके बावजूद इन नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

राजनीति के पीछे की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • महेश्वर हजारी और अशोक चौधरी, Nitish Kumar के करीबी हैं
  • वे दलित समाज से आते हैं, इसलिए कार्रवाई से राजनीतिक संदेश गलत जा सकता था

वहीं, गिरिधारी यादव के मामले में:

  • वे यादव समुदाय से आते हैं
  • यह वर्ग JDU का पारंपरिक वोट बैंक नहीं माना जाता

ऐसे में पार्टी कड़ा रुख अपनाकर संगठन में अनुशासन का संदेश देना चाहती

कुल मिलाकर, JDU का नोटिस राजनीतिक दबाव जरूर बनाता है, लेकिन मौजूदा कानून और पुराने उदाहरणों को देखते हुए गिरिधारी यादव की लोकसभा सदस्यता पर तत्काल कोई खतरा नजर नहीं आता। यह मामला ज्यादा सियासी संदेश और रणनीति का हिस्सा लगता है, न कि तुरंत कार्रवाई का संकेत।

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