पटना/नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट साफ सुनाई देने लगी है। लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहे Nitish Kumar अब दिल्ली की सियासत की ओर बढ़ चुके हैं। राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के साथ ही उन्होंने यह संकेत दे दिया है कि पटना की कुर्सी जल्द ही खाली होने वाली है।
उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan द्वारा शपथ दिलाए जाने के दौरान सत्ता पक्ष के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे। J. P. Nadda से लेकर Rajiv Ranjan Singh और Samrat Choudhary तक की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया।
नीतीश कुमार का यह कदम केवल एक औपचारिक संसदीय बदलाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। करीब दो दशकों से अधिक समय तक सत्ता पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेता का अचानक राज्य की राजनीति से केंद्र की ओर रुख करना कई सवाल खड़े कर रहा है।
सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे के बाद सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। जदयू के भीतर नेतृत्व को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है, वहीं गठबंधन की राजनीति में भी नए समीकरण उभरने की संभावना है।
यह भी दिलचस्प है कि 30 मार्च को उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी थी और 16 मार्च को ही राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके थे। यानी यह पूरा कदम सुनियोजित रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
नीतीश कुमार ने खुद इसे “व्यक्तिगत इच्छा” बताया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे एक बड़े रणनीतिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं। दिल्ली में सक्रिय रहते हुए भी बिहार की राजनीति पर पकड़ बनाए रखने का उनका बयान इस ओर इशारा करता है कि वह पूरी तरह पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सत्ता से संन्यास है या फिर किसी बड़ी राजनीतिक भूमिका की तैयारी? बिहार की राजनीति आने वाले दिनों में नए मोड़ लेने को तैयार दिख रही है।
पटना से राहुल कुमार की रिपोर्ट















