बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कटिहार जिले से सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने सिस्टम की लापरवाही और अव्यवस्था की पोल खोल दी है।
आमतौर पर एक एंबुलेंस में मरीज और उनके एक-दो अटेंडेंट सहित 4 से 6 लोगों को ले जाने का नियम होता है, लेकिन कटिहार में इस नियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत आजमनगर से कुपोषित बच्चों को जांच के लिए सदर अस्पताल लाया जा रहा था। नियम के अनुसार प्रत्येक एंबुलेंस में सीमित संख्या में बच्चे और उनके परिजन होने चाहिए, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलट रही।
एक ही एंबुलेंस में 7 कुपोषित बच्चे और 10 परिजन, कुल 17 लोग ठूंसकर अस्पताल लाए गए। इस ओवरलोडिंग ने न सिर्फ नियमों का उल्लंघन किया, बल्कि बच्चों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार एंबुलेंस को मिनी बस की तरह इस्तेमाल किया गया, जिससे सफर बेहद असुरक्षित और अमानवीय हो गया।
जब इस मामले पर एंबुलेंस चालक और संबंधित डॉक्टर से सवाल किए गए तो उन्होंने इसे “मजबूरी” और “ऊपर से आए आदेश” का हवाला देकर खुद को बचाने की कोशिश की। हालांकि दोनों ने यह स्वीकार किया कि कहीं न कहीं गलती हुई है।
इस घटना के सामने आने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य विभाग को जांच के आदेश दिए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर दोषियों पर ठोस कार्रवाई होगी?
कटिहार की यह घटना बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की उस हकीकत को उजागर करती है, जहां नियम कागजों में और लापरवाही जमीन पर दिखाई देती है।














