बिहार में आगामी पंचायत चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमाता जा रहा है। पंचायती राज व्यवस्था की बुनियाद से जुड़े एक अहम मुद्दे—परिसीमन—को लेकर अब मामला अदालत तक पहुंच गया है। पटना हाईकोर्ट में दायर एक याचिका ने राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह याचिका मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश कुमार समेत कई जनप्रतिनिधियों द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं में पंच-सरपंच संघ के प्रादेशिक अध्यक्ष अमोद निराला और जिला परिषद संघ के अध्यक्ष कृष्णा यादव जैसे नाम भी शामिल हैं। सभी ने अदालत से मांग की है कि पंचायतों का नया परिसीमन तत्काल कराया जाए।
याचिका में बताया गया है कि बिहार में पंचायतों का अंतिम परिसीमन वर्ष 1994 में किया गया था, जो 1991 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित था। यानी तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज भी उसी पुराने ढांचे पर पंचायत चुनाव कराए जा रहे हैं। इस दौरान राज्य की जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और स्थानीय निकायों की संरचना में बड़े बदलाव हुए हैं, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया अब तक लंबित है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि वर्ष 2021-22 में राज्य सरकार ने 154 नगर पंचायत, 88 नगर परिषद और 19 नगर निगम का गठन कर कुल 261 नए शहरी निकाय बनाए। इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की सीमाओं में बड़ा बदलाव आया, लेकिन पंचायतों की सीमाएं अब भी पुराने नक्शे पर कायम हैं। इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के खिलाफ बताया जा रहा है।
इस मुद्दे को लेकर कई बार संबंधित विभागों और अधिकारियों के समक्ष आवेदन दिए गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। अब याचिकाकर्ता न्याय की उम्मीद में पटना हाईकोर्ट पहुंचे हैं, ताकि 2026 के पंचायत चुनाव से पहले नई जनसंख्या के आधार पर परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया पूरी कराई जा सके।
याचिका में एक और गंभीर आरोप भी लगाया गया है। एक याचिकाकर्ता का वाहन जब्त किए जाने के बाद अब तक वापस नहीं किया गया है। दावा किया गया है कि वाहन खुले आसमान के नीचे पड़ा-पड़ा खराब हो रहा है, जो प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
अब पूरे बिहार की नजर पटना हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी है। देखना यह होगा कि अदालत इस संवैधानिक और सियासी मुद्दे पर सरकार को क्या निर्देश देती है। यह फैसला न सिर्फ पंचायत चुनाव 2026 की दिशा तय करेगा, बल्कि राज्य की जमीनी राजनीति पर भी गहरा असर डाल सकता है।


















