बिहार की राजनीति में इन दिनों सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा अपने सहयोगी दलों को कमजोर करने की राजनीति करती है। राजद का दावा है कि भाजपा “अजगर की तरह सहयोगियों को निगलने” की रणनीति पर काम करती है।
राजद का कहना है कि वर्ष 2014 के बाद से भाजपा पर कई बार यह आरोप लगा है कि वह न सिर्फ विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़कर सत्ता हासिल करती है, बल्कि अपने सहयोगी दलों को भी धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश करती है। बिहार में चल रहे ताजा सियासी घटनाक्रम के बीच राजद ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है।
पटना में राजद की ओर से इसको लेकर पोस्टर भी लगाए गए हैं। इन पोस्टरों में लिखा गया है— “ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको भाजपा ने ठगा नहीं।” पोस्टर के जरिए राजद ने भाजपा की राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।
कई राज्यों के उदाहरण दे रहा राजद
राजद का कहना है कि पिछले एक दशक में देश के कई राज्यों में ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जहां चुनाव परिणामों के बाद सत्ता का समीकरण बदल गया और भाजपा सरकार बनाने में सफल रही।
उदाहरण के तौर पर गोवा और मणिपुर का हवाला दिया जा रहा है। इन दोनों राज्यों में चुनाव के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी, लेकिन छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से उसने सरकार बना ली।
वहीं अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के कई विधायकों के दल बदलने के बाद भाजपा सत्ता में आई। इसके अलावा कर्नाटक और मध्य प्रदेश की घटनाएं भी काफी चर्चित रही हैं।
कर्नाटक में वर्ष 2019 में कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की गठबंधन सरकार गिरने के बाद भाजपा सत्ता में आई। वहीं मध्य प्रदेश में वर्ष 2020 में कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कमल नाथ की सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा ने दोबारा सत्ता संभाली।
महाराष्ट्र की राजनीति में भी बड़ा बदलाव
महाराष्ट्र में भी सत्ता का समीकरण नाटकीय ढंग से बदला। पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार गिरी और बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनी, जिसे भाजपा का समर्थन मिला। शिवसेना के भीतर हुई टूट ने राज्य की राजनीति की दिशा ही बदल दी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने सिर्फ विपक्षी दलों के खिलाफ ही नहीं बल्कि अपने सहयोगियों के बीच भी धीरे-धीरे अपना वर्चस्व बढ़ाया है। कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर), महाराष्ट्र में शिवसेना, पूर्वोत्तर के कई छोटे क्षेत्रीय दलों और पंजाब में लंबे समय तक सहयोगी रहे शिरोमणि अकाली दल के साथ रिश्तों में आई दूरी को भी इसी संदर्भ में देखा जाता है।
अब बिहार में तेज हुई चर्चा
अब यही चर्चा बिहार की राजनीति में भी तेज हो गई है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव जीता था और सत्ता बरकरार रखी थी।
हालांकि हालिया राजनीतिक चर्चाओं में यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजा जा सकता है। इन चर्चाओं के बाद बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।
राजद का दावा है कि भाजपा अब बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। पार्टी का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो जनता दल (यूनाइटेड) की भूमिका सीमित हो सकती है और भविष्य में जदयू को बड़े राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि भाजपा और जदयू दोनों ही दल इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते रहे हैं और इसे विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजी बता रहे हैं।
जातीय राजनीति भी बड़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति का समीकरण अन्य राज्यों से अलग है। यहां क्षेत्रीय दलों की मजबूत मौजूदगी और जातीय राजनीति का गहरा प्रभाव है।
एनडीए में शामिल कई दल—जैसे लोजपा (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और अन्य क्षेत्रीय दल—अपने-अपने जातीय जनाधार पर टिके हुए हैं। ऐसे में अगर जदयू को लेकर कोई बड़ा सियासी प्रयोग होता है तो इससे एनडीए के भीतर भी अविश्वास बढ़ सकता है।
फिलहाल बिहार की राजनीति में उठ रहे इन सवालों ने एक बार फिर उस बहस को तेज कर दिया है कि क्या भाजपा की सियासी रणनीति का अगला बड़ा प्रयोग बिहार में होने वाला है या यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रहेगा।



















