बिहार की सियासत एक बार फिर उबाल पर है। यहां राजनीति कभी ठहरती नहीं—हर दिन नए समीकरण बनते हैं और पुराने रिश्ते टूटते-बिखरते हैं। आजादी की लड़ाई से लेकर जेपी आंदोलन 1974 तक, बिहार ने हमेशा देश की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि यहां की राजनीति को हमेशा से देश की सबसे जीवंत और जटिल सियासत माना जाता रहा है।
90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे सत्ता का ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा किया, जिसने करीब 15 साल तक बिहार की राजनीति पर पकड़ बनाए रखी। इस दौर में राबड़ी देवी ने भी मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली। हालांकि, समय के साथ राजनीतिक हवा बदली और 2005 में नीतीश कुमार के उदय के साथ बिहार की राजनीति ने नया मोड़ लिया। “जंगलराज” के आरोपों के बीच विकास और सुशासन का एजेंडा सामने आया, जिसने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी।
लेकिन बिहार की सियासत में स्थिरता शायद ही कभी देखी गई हो। नीतीश कुमार की राजनीतिक रणनीतियां और गठबंधन बदलने की प्रवृत्ति हमेशा चर्चा में रही है। कभी भाजपा के साथ, तो कभी विपक्षी खेमे के साथ—उनकी सियासी चालों ने उन्हें राजनीति का सबसे लचीला और चतुर खिलाड़ी बना दिया है। हालांकि अब विपक्ष उन पर लगातार हमलावर है।
विपक्ष का आरोप है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक धार पहले जैसी नहीं रही और वे भाजपा के प्रभाव में आ चुके हैं। खास तौर पर गृह विभाग जैसे अहम मंत्रालय को सम्राट चौधरी को सौंपने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे में तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव की जोड़ी को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। 2015 और 2022 के गठबंधन की यादें अभी भी ताजा हैं और एक बार फिर किसी बड़े राजनीतिक “खेल” की संभावनाओं को हवा दी जा रही है।
इस बीच ताजा सियासी हलचल की सबसे बड़ी वजह बना है राज्यसभा चुनाव। नीतीश कुमार खुद राज्यसभा पहुंच चुके हैं, लेकिन इसके साथ ही एक नया संवैधानिक पेच सामने आ गया है। नियम के मुताबिक, उन्हें 14 दिनों के भीतर राज्यसभा या विधान परिषद—दोनों में से किसी एक की सदस्यता छोड़नी होगी। 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अब उनके सामने 30 मार्च तक का समय है।
अगर नीतीश कुमार 30 मार्च तक विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उनकी राज्यसभा सदस्यता स्वतः समाप्त हो सकती है। यही डेडलाइन अब सियासत का नया केंद्र बन गई है। बिहार से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे पर चर्चाएं तेज हैं और हर कोई इस फैसले के पीछे छिपे राजनीतिक संदेश को समझने की कोशिश कर रहा है।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक दांव छिपा है? क्या नीतीश कुमार एक नई रणनीति के तहत अपनी सियासी भूमिका बदलने की तैयारी में हैं? या फिर यह महज औपचारिक प्रक्रिया है जिसे विपक्ष मुद्दा बना रहा है?
फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां हर कदम के पीछे गहरी सियासी गणित छिपी होती है। आने वाले कुछ दिन बेहद अहम होंगे, क्योंकि 30 मार्च की डेडलाइन न सिर्फ एक संवैधानिक फैसला तय करेगी, बल्कि बिहार की सियासत की अगली दिशा भी साफ कर सकती है।


















