बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव एक ऐसा नाम हैं, जिनकी सियासत के साथ-साथ उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी हमेशा चर्चा में रहती हैं। खासकर उनका दही-चूड़ा भोज और इफ्तार पार्टी हर साल सियासी और सामाजिक मेल-मिलाप का बड़ा मंच माना जाता रहा है। लेकिन इस बार ये परंपरा टूटती नजर आ रही है।
मकर संक्रांति के मौके पर जहां हर साल राबड़ी देवी के आवास पर भव्य दही-चूड़ा भोज का आयोजन होता था, वहीं इस बार ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। अब रमजान के दौरान आयोजित होने वाली पारंपरिक इफ्तार पार्टी भी नहीं की गई, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
आमतौर पर पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी आवास पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता था, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के बड़े नेता शामिल होते थे। यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक या पारिवारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सियासी रिश्तों को मजबूत करने का भी अहम जरिया माना जाता था।
गौरतलब है कि पिछले साल इफ्तार पार्टी अब्दुल बारी सिद्दीकी के सरकारी आवास पर आयोजित की गई थी, जिसमें तेजस्वी यादव समेत कई बड़े नेता शामिल हुए थे। वह आयोजन भी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ओर से ही किया गया था। हालांकि इस बार न तो राबड़ी आवास, न ही सिद्दीकी के आवास और न ही पार्टी कार्यालय में कोई इफ्तार पार्टी आयोजित की गई।
बताया जा रहा है कि करीब 20 साल पुरानी यह परंपरा पहली बार टूटी है। इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मुद्दे पर RJD पर निशाना साधा है, जबकि RJD का कहना है कि पार्टी की ओर से जिला स्तर पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जा रहा है।
दरअसल, लालू प्रसाद यादव की इफ्तार पार्टी हमेशा से खास रही है, जहां अलग-अलग विचारधाराओं के नेता एक साथ नजर आते थे। इसे बिहार की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी माना जाता रहा है। ऐसे में इस परंपरा का टूटना महज एक आयोजन का रुकना नहीं, बल्कि सियासी संकेतों के तौर पर भी देखा जा रहा है।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह बदलाव सिर्फ परिस्थितियों का नतीजा है या फिर बिहार की सियासत में किसी बड़े बदलाव का संकेत। फिलहाल, इस घटनाक्रम ने एक बार फिर RJD और लालू परिवार को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।














