बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक (असिस्टेंट प्रोफेसर) की नियुक्ति अब केवल डिग्रियों के आधार पर नहीं, बल्कि कड़ी चयन प्रक्रिया के जरिए की जाएगी। राजभवन की ओर से तैयार की जा रही नई नियमावली के मुताबिक अब असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली के लिए 200 अंकों की चयन प्रक्रिया लागू करने की तैयारी है।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, चयन प्रक्रिया में 160 अंकों की लिखित परीक्षा और 40 अंकों का साक्षात्कार शामिल होगा। इस नई नियमावली का मसौदा राजभवन की ओर से राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को भेज दिया गया है। उनसे कहा गया है कि वे 10 दिनों के भीतर अपने हस्ताक्षर और सुझाव भेज दें। यदि कुलपतियों की सहमति मिल जाती है, तो माना जा रहा है कि यह नई नियमावली जल्द ही लागू की जा सकती है।
लिखित परीक्षा होगी वर्णनात्मक
नई व्यवस्था के तहत लिखित परीक्षा वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) होगी। इसका उद्देश्य यह है कि उम्मीदवारों के विषय ज्ञान, विश्लेषण क्षमता और समझ का सही मूल्यांकन किया जा सके। इससे केवल रटकर परीक्षा पास करने के बजाय विषय की गहराई से समझ रखने वाले उम्मीदवारों को फायदा मिल सकता है।
आयु सीमा भी तय
प्रस्तावित नियमावली में उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम आयु 23 वर्ष और अधिकतम आयु 45 वर्ष तय की गई है। खास बात यह है कि इस नई चयन प्रक्रिया में अनुभव के लिए अलग से अंक देने का प्रावधान नहीं रखा गया है।
NET, JRF और PhD सिर्फ पात्रता
नई व्यवस्था के तहत NET, JRF और PhD जैसी योग्यताएं केवल पात्रता मानी जाएंगी। यानी इन डिग्रियों के आधार पर उम्मीदवार आवेदन तो कर सकेंगे, लेकिन इनके लिए अतिरिक्त अंक नहीं दिए जाएंगे। इसका मतलब यह है कि अब उम्मीदवारों को चयन के लिए मुख्य रूप से लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में बेहतर प्रदर्शन करना होगा।
आयोग के जरिए होगी पूरी प्रक्रिया
असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली की पूरी प्रक्रिया बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से कराई जाएगी। साक्षात्कार पैनल में भी केवल प्रोफेसर रैंक के सदस्य शामिल होंगे, ताकि चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जा सके।
खाली पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ
यदि यह नियमावली लागू होती है, तो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से खाली पड़े पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ हो सकता है। शिक्षा जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी और कड़ी चयन प्रक्रिया से योग्य उम्मीदवारों को मौका मिलेगा और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह नया इम्तिहानी सिस्टम वास्तव में मेरिट को बढ़ावा देता है या फिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक नई बहस को जन्म देता है।




















