ओबीसी 83, लेकिन ईबीसी सिर्फ 37 सीटों पर; सवर्ण पहुंचे 72 पर**
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच बड़ा फासला एक बार फिर सामने ला दिया है।
243 सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ 37 जातियों की प्रतिनिधित्व तो दिख रहा है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को इस चुनाव में सबसे गहरा झटका लगा है।
सबसे बड़ा विरोधाभास:
बिहार की कुल जातीय आबादी में EBC की संख्या OBC से 32% अधिक,
लेकिन
विधानसभा में OBC के 83 विधायक,
जबकि
EBC सिर्फ 37 सीटों तक सीमित!
यह अंतर बताता है कि बिहार की राजनीति में जीत का आधार सिर्फ संख्या बल नहीं बल्कि राजनीतिक नेटवर्क, संसाधन और सांगठनिक मजबूती है।
सवर्णों की मजबूत वापसी
सवर्ण 72 सीटों के साथ शीर्ष पर
दलित–आदिवासी: 40 सीटें
मुस्लिम विधायक: 11
कौन-कौन सबसे ऊपर?
चार या अधिक विधायक देने वाली जातियों में:
राजपूत – 32 (आबादी सिर्फ 3.45%)
यादव – 26
कोइरी – 26
भूमिहार – 25
कुर्मी – 14
ब्राह्मण – 13
दलित समुदाय में:
दुसाध – 11
रविदास – 11
अत्यंत पिछड़े वर्ग में:
तेली – 9
धानुक – 9
मुसहर – 9
कई छोटी जातियों जैसे कानू, कलवार, सूड़ी, मल्लाह ने भी सीमित आबादी के बावजूद विधानसभा में जगह बना ली।
लंबी सूची दिखाती है कि बिहार की सामाजिक बनावट बहुत विविध है,
लेकिन राजनीति अब भी सीमित जातीय समूहों और मजबूत संगठनों के हाथों में केंद्रित है।
चुनावी नतीजे साफ संकेत दे रहे हैं—
बिहार की सामाजिक तस्वीर बड़ी है, पर राजनीतिक तस्वीर अभी भी छोटी और नियंत्रित।

















