फाल्गुन मास की पावन पूर्णिमा इस वर्ष एक अनोखा और रहस्यमयी संयोग लेकर आई है। धर्मशास्त्रों के अनुसार भद्रा, प्रदोषकाल और खग्रास चंद्रग्रहण का संगम इस बार होली पर्व को अत्यंत विशिष्ट बना रहा है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में संशय है कि होलिका दहन कब करें और धुलंडी किस दिन मनाएँ?
पूर्णिमा दो दिन, बढ़ा संशय
शास्त्रों का स्पष्ट विधान है कि पूर्णमासी में होलिका दहन और प्रतिपदा में रंगोत्सव (धुलंडी) मनाया जाता है। किंतु इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा 2 और 3 मार्च दोनों दिन पड़ रही है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
हृषीकेश पंचांग के अनुसार पूर्णिमा 2 मार्च सायं 5:18 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च सायं 4:33 बजे तक रहेगी।
भद्रा काल में दहन वर्जित
2 मार्च 2026 को फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी के साथ भद्रा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों में भद्रा काल में शुभ कार्य निषिद्ध माने गए हैं।
- 2 मार्च को सायंकाल से ही भद्रा प्रवेश करेगी।
- प्रदोषकाल भद्रा से बाधित रहेगा।
- अतः भद्रा समाप्ति के बाद ही होलिका दहन शास्त्रसम्मत माना गया है।
होलिका दहन का श्रेष्ठ मुहूर्त
- मध्यरात्रि 12:50 बजे से 2:02 बजे तक — श्रेष्ठ समय
- लोकाचार अनुसार रात्रि 11:57 बजे से प्रातः 5:10 बजे तक — अनुकूल समय
अतः 2-3 मार्च की दरमियानी रात भद्रा समाप्ति के पश्चात होलिका दहन करना ही धर्मसम्मत मार्ग है।
3 मार्च को खग्रास चंद्रग्रहण का योग
इसी बीच 3 मार्च को ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण का दुर्लभ संयोग बन रहा है।
- ग्रहण प्रारंभ: दोपहर 3:20 बजे
- मध्य: 5:04 बजे
- समाप्ति: 6:47 बजे
- भारत में दृश्य: चंद्रोदय के समय सायं 5:59 बजे से (केवल मोक्षकाल)
सूतक काल
ग्रहण से 9 घंटे पूर्व, प्रातः 6:20 बजे से सूतक काल लागू हो जाएगा।
इस दौरान:
- पूजन, मूर्ति स्पर्श
- मांगलिक कार्य
- नए कार्यों का आरंभ
वर्जित रहेगा।
गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
किन राज्यों में दिखेगा ग्रहण?
पूर्वोत्तर के राज्यों —
Mizoram,
Assam,
Nagaland,
Manipur,
Arunachal Pradesh —
में ग्रहण स्पष्ट दिखाई देगा।
जबकि
Delhi,
Uttar Pradesh,
Maharashtra,
Rajasthan,
West Bengal
में आंशिक दर्शन होंगे।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि धुलंडी पर ग्रहण का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं रहेगा, क्योंकि रंगोत्सव प्रातःकाल में संपन्न होता है।
- 2 मार्च की रात — होलिका दहन
- 3 मार्च — ग्रहण प्रभाव के कारण रंगोत्सव अनुचित
- 4 मार्च, बुधवार — धुलंडी मनाई जाएगी
निष्कर्ष
इस वर्ष होली भद्रा, प्रदोषकाल और चंद्रग्रहण के दुर्लभ संगम से आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत विशेष बन गई है। शास्त्र, ज्योतिष और लोकाचार के संतुलन के साथ 2-3 मार्च की रात्रि में होलिका दहन तथा 4 मार्च को धुलंडी मनाना ही धर्मसम्मत मार्ग माना गया है।
यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि धार्मिक मर्यादा और ज्योतिषीय संयोगों की अद्भुत छटा का भी प्रतीक बनेगी।


















