मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, ईरान में जारी संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट पर संभावित नाकेबंदी की आशंकाओं के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पहले से ही दबाव में है। अब इस संकट में एक नया मोड़ सामने आया है—पाम ऑयल की संभावित कमी, जो सीधे आम आदमी की रसोई और बाजार को प्रभावित कर सकती है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक देश है, जहां हर साल लगभग 9.5 मिलियन टन पाम ऑयल की खपत होती है। इसके मुकाबले देश में इसका उत्पादन बेहद सीमित है—4 लाख टन से भी कम, यानी लगभग पूरी जरूरत आयात पर निर्भर है।
यह निर्भरता अब आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर चिंता का विषय बनती जा रही है। भारत अपने पाम ऑयल आयात का बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया और मलेशिया से प्राप्त करता है, जिसमें अकेले इंडोनेशिया की हिस्सेदारी करीब आधी है।
लेकिन अब स्थिति और गंभीर हो गई है क्योंकि इंडोनेशिया ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा घरेलू बायोडीजल प्रोग्राम (B50) में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया है। इससे वैश्विक बाजार में हर साल लगभग 15 से 20 लाख टन पाम ऑयल की कमी का अनुमान लगाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो भारत में खाने के तेल की कीमतों में तेज़ उछाल देखने को मिल सकता है। पहले से ही महंगाई से जूझ रही जनता पर यह एक और बड़ा आर्थिक दबाव साबित हो सकता है।
सरकारी और नीति-निर्माण स्तर पर अब इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है और वैकल्पिक स्रोतों तथा घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।
कुल मिलाकर, क्रूड ऑयल संकट के बाद अब पाम ऑयल संकट ने भारत की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा दोनों को एक नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है, जिसका असर आने वाले समय में हर घर की रसोई तक महसूस किया जा सकता है।


















