निर्वाचन आयोग के एक पत्र पर भाजपा की मुहर मिलने से देशभर में सियासी विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला केरल से जुड़ा है, जहां विधानसभा चुनाव के प्रचार के बीच यह मुद्दा सामने आया और देखते ही देखते राजनीतिक बहस तेज हो गई।
बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर 19 मार्च 2019 का चुनाव आयोग का एक पत्र वायरल हुआ, जिसके साथ जुड़े हलफनामे पर भारतीय जनता पार्टी (केरल इकाई) की मुहर लगी हुई दिखाई दी। इसके बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
सीपीआई(एम) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि क्या अब चुनाव आयोग और बीजेपी एक ही पावर सेंटर से संचालित हो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज पर बीजेपी की मुहर कैसे पहुंची।
इस विवाद में बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी राजद भी कूद पड़ी है। पार्टी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जब एक संवैधानिक संस्था सत्ताधारी दल के “क्लर्क” तक सिमट जाती है, तो हर गलती को क्लेरिकल एरर कहकर टाल दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
हालांकि, पूरे मामले में निर्वाचन आयोग के केरल कार्यालय ने सफाई दी है। अधिकारियों के अनुसार, यह पूरी तरह एक “क्लेरिकल एरर” था। बताया गया कि केरल बीजेपी ने हाल ही में एक पुरानी गाइडलाइन की कॉपी जमा की थी, जिस पर उनकी मुहर लगी थी, और उसी कॉपी को गलती से अन्य राजनीतिक दलों को भेज दिया गया।
इस घटना के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कार्रवाई करते हुए संबंधित असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर को जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया है।
फिलहाल, इस मामले ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।















