बिहार में सरकारी दफ्तरों की फाइलों के भीतर जो खेल खेला गया है, उसने कानून, नियम और नीयत—तीनों का जनाज़ा निकाल दिया है। मोतीहारी से सामने आया मामला बताता है कि कैसे अफसरों और भूमाफियाओं की गठजोड़ गैंग ने “कलम की नोक” से सरकार की आंखों में धूल झोंक दी और करोड़ों रुपये की बेशकीमती सरकारी ज़मीन को काग़ज़ी जादू से निजी संपत्ति बना दिया।

मामला बकास्त वृत्तदार बाजार की करीब 1.98 एकड़ कीमती सरकारी ज़मीन से जुड़ा है। आरोप है कि डीसीएलआर के नेतृत्व में गठित जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय जानबूझकर जमीन के नाम से सिर्फ “बाजार” शब्द गायब कर दिया।
बस एक शब्द हटा—और जमीन की क़िस्मत ही बदल गई।
“बकास्त वृत्तदार बाजार” को रिपोर्ट में सिर्फ “बकास्त” लिख दिया गया, जिससे जमीन की किस्म बदल गई और सरकार व वरीय अधिकारियों को गुमराह कर दिया गया। इस फर्जीवाड़े का सीधा नतीजा यह हुआ कि एसडीओ स्तर पर चल रहा अतिक्रमण वाद अचानक बंद कर दिया गया।
यह वही जमीन थी, जो कानूनन पूरी तरह राज्य सरकार की मिल्कियत थी। लेकिन फर्जी रिपोर्ट के सहारे भूमाफिया उस पर छाती तानकर बैठ गए।
जांच अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 7A को सरेआम रौंद दिया। यह धारा साफ कहती है कि हाट या बाजार किस्म की जमीन पर किसी भी मध्यवर्ती व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं हो सकता।
गौरतलब है कि अरेराज अनुमंडल के अतिक्रमण वाद संख्या 42/2019-20 में एक अतिक्रमणकारी को उक्त 1.98 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जेदार के रूप में चिन्हित किया गया था। वहां व्यावसायिक और आवासीय निर्माण तक खड़े कर दिए गए थे।
लेकिन जांच प्रतिवेदन में तथ्यों का गला घोंट दिया गया, गलत राय दी गई और पूरे केस की योजनाबद्ध तरीके से हत्या कर दी गई।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अवैध जमाबंदी रद्द करने के बजाय, अंचलाधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पूरा अतिक्रमण वाद ही दफन कर दिया। यह न सिर्फ बिहार सार्वजनिक भूमि अतिक्रमण अधिनियम बल्कि माननीय न्यायालय के आदेशों की भी खुली अवहेलना है।
अब सवाल यह है—
क्या मोतीहारी में सरकारी जमीन यूं ही अफसर-भूमाफिया की सांठगांठ की भेंट चढ़ती रहेगी?
या फिर इस फाइल-फ्रॉड पर कभी कानून का डंडा चलेगा?
फिलहाल, यह मामला सिस्टम के उस सड़े हुए चेहरे को बेनकाब कर गया है, जिसे अक्सर फाइलों के ढेर के नीचे दबा दिया जाता है।

















