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बिहार चुनाव में कांग्रेस की करारी हार, 60 में सिर्फ़ 6 सीटें—वोट शेयर भी गिरा, पिछले दशक का सबसे खराब प्रदर्शन

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने महागठबंधन के लिए बड़ा झटका दिया है। राजद, कांग्रेस और अन्य दलों के गठबंधन को इस बार अप्रत्याशित और भारी हार का सामना करना पड़ा है। एनडीए की प्रचंड जीत के बीच महागठबंधन लगभग पूरी तरह ढह गया।
इनमें सबसे खराब स्थिति कांग्रेस पार्टी की रही, जिसकी सीटें और वोट शेयर दोनों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

⭐ कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक — 60 में से केवल 6 सीटें

इस बार कांग्रेस ने 60 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी सिर्फ़ 6 सीटें जीतने में सफल रही। यानी कांग्रेस का हर 10 में से सिर्फ़ 1 उम्मीदवार ही जीत सका।
यह परिणाम पार्टी के पिछले कई चुनावों की तुलना में सबसे कमजोर प्रदर्शन माना जा रहा है।

⭐ कांग्रेस का वोट शेयर भी गिरा

2025 में वोट शेयर: 8.71%

2020 में वोट शेयर: 9.6% (70 सीटों पर चुनाव लड़ा था)

यानी कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 1% कम हो गया, और सीटों में तो गिरावट और भी ज्यादा देखने को मिली।

⭐ पिछले चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

बिहार में कांग्रेस के लिए पिछले दो दशक बेहद कठिन रहे हैं।
पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे आता गया:

2020: 19 सीटें

2015: 27 सीटें

2010: 4 सीटें

इन आंकड़ों से साफ है कि कांग्रेस बिहार में धीरे-धीरे अपना राजनीतिक आधार खोती चली गई है और 2025 का चुनाव पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।

⭐ महागठबंधन की हार और कांग्रेस की भूमिका

इस चुनाव में महागठबंधन को राजद की कमजोरी, अंदरूनी मतभेद और सही समय पर रणनीति न बना पाने का नुकसान उठाना पड़ा।
हालांकि कांग्रेस का खराब प्रदर्शन गठबंधन के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ क्योंकि पार्टी न सिर्फ सीटें नहीं ला सकी, बल्कि वोट शेयर भी नीचे खिसक गया।

⭐ विश्लेषण: क्यों हारा कांग्रेस?

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार कांग्रेस की हार के पीछे कई प्रमुख कारण रहे:

ग्राउंड लेवल पर कमजोर संगठन

कैंडिडेट चयन में कमी

गठबंधन में भूमिका अस्पष्ट रहना

प्रचार में आक्रामकता की कमी

स्थानीय नेताओं का कम प्रभाव

ये सभी कारण मिलकर कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान बन गए।

बिहार चुनाव 2025 कांग्रेस के लिए बड़ा संदेश लेकर आया है।
60 में से सिर्फ 6 सीटें और गिरता वोट शेयर इस बात का संकेत है कि पार्टी को अब बिहार में अपनी रणनीति, संगठन और नेतृत्व को नए सिरे से खड़ा करना होगा।
महागठबंधन की हार ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के लिए बिहार की जमीन अब पहले से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो चुकी है।

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