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बधाई हो! निलंबन खत्म होते ही IAS संजीव हंस को अहम पद, ₹100 करोड़ के भ्रष्टाचार आरोपों के बीच नीतीश सरकार पर सवाल

पटना।
बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और टेंडर घोटालों के गंभीर आरोपों में घिरे वरिष्ठ IAS अधिकारी संजीव हंस को नीतीश सरकार ने बड़ा तोहफा दे दिया है। निलंबन समाप्त करते हुए सरकार ने उन्हें राजस्व परिषद का अपर सचिव नियुक्त कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) का मामला अभी भी अदालत में लंबित है।

संजीव हंस 1997 बैच के बिहार कैडर के IAS अधिकारी हैं। वे मेडिकल, कंस्ट्रक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा जैसे बेहद अहम और मलाईदार विभागों में लंबे समय तक तैनात रहे। इन्हीं कार्यकालों के दौरान उन पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और धन शोधन के आरोप लगे।

ED की छापेमारी, नोट गिनने के लिए मशीनें कम पड़ गईं

संजीव हंस का नाम उस वक्त सुर्खियों में आया था जब ED की छापेमारी के दौरान इतनी भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई कि नोट गिनने की मशीनें तक कम पड़ गई थीं। जांच में सामने आया कि हंस ने आय से अधिक संपत्ति अर्जित की और बेनामी तरीके से निवेश किया।

ईडी की जांच में करीब ₹100 से ₹120 करोड़ की अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसी ने 70 से अधिक संदिग्ध बैंक खातों का भी पता लगाया, जिनका इस्तेमाल हवाला और बेनामी लेनदेन के लिए किया गया।

ऊर्जा विभाग में रहते हुए सबसे बड़े घोटाले के आरोप

जुलाई 2020 से अगस्त 2024 तक संजीव हंस बिहार के ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव और बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड (BSPHCL) के चेयरमैन रहे। इसी दौरान उन पर ₹3,300 करोड़ के स्मार्ट प्रीपेड मीटर टेंडर घोटाले का आरोप लगा।

ईडी की चार्जशीट के मुताबिक, जीनस पावर इंफ्रा लिमिटेड को स्मार्ट मीटर लगाने का ठेका दिलाने के बदले रिश्वत ली गई। यह रिश्वत उप-ठेकेदारों और प्रॉक्सी कंपनियों के जरिए दी गई। जांच में यह भी सामने आया कि हंस को एक लग्जरी मर्सिडीज कार तक दी गई थी।

सोलर लाइट योजना में भी भारी गड़बड़ी

संजीव हंस पर पंचायत स्तर पर सोलर लाइट योजना में भी बड़े घोटाले का आरोप है। बिहार मुखिया महासंघ ने आरोप लगाया कि ₹17,000 की सोलर लाइट को ₹30,500 में लगवाया गया। घटिया गुणवत्ता की लाइटें जल्द ही खराब हो गईं, जिससे पंचायतों को करोड़ों का नुकसान हुआ।

यौन उत्पीड़न और सामूहिक दुष्कर्म का मामला

2021 में एक महिला वकील ने संजीव हंस और पूर्व RJD विधायक गुलाब यादव पर सामूहिक दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया था। इस मामले में जनवरी 2023 में FIR दर्ज हुई थी, हालांकि सितंबर 2023 में पटना हाईकोर्ट ने FIR को रद्द कर दिया। इसके बावजूद यह मामला लंबे समय तक राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा में बना रहा।

ED की कार्रवाई: करोड़ों की संपत्ति जब्त

ईडी की कार्रवाई में अब तक:

  • ₹11.64 करोड़ नकद
  • ₹23.72 करोड़ की अचल संपत्ति
  • सोना, चांदी, महंगी घड़ियां
  • दिल्ली, जयपुर, नागपुर, लखनऊ और कसौली में फ्लैट व प्लॉट
  • पुणे में CNG पेट्रोल पंप

जैसी संपत्तियां सामने आई हैं। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि ये संपत्तियां करीबी सहयोगियों और रिश्तेदारों के नाम पर खरीदी गई थीं।

गिरफ्तारी और जेल

18 अक्टूबर 2024 को ED ने संजीव हंस को पटना स्थित सरकारी आवास से गिरफ्तार किया था। वे करीब 10 महीने तक बेऊर केंद्रीय जेल में न्यायिक हिरासत में रहे। ED ने इस मामले में करीब 20 हजार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है।

निलंबन खत्म, फिर अहम पद

15 दिसंबर 2025 को बिहार सरकार ने संजीव हंस का निलंबन समाप्त कर दिया। इसके बाद 29 दिसंबर 2025 को उन्हें राजस्व परिषद का अपर सचिव नियुक्त किया गया। सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता के बीच भी सवाल उठ रहे हैं कि जब मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के मामले अभी लंबित हैं, तो ऐसे अधिकारी को अहम पद क्यों दिया गया?

नीतीश सरकार पर उठे सवाल

संजीव हंस को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का “पसंदीदा IAS अधिकारी” माना जाता रहा है। ऐसे में यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या सत्ता के संरक्षण में इतने बड़े घोटाले संभव हुए? क्या सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों को नजरअंदाज कर रही है?

भ्रष्टाचार की व्यवस्था का प्रतीक

संजीव हंस का मामला बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल बन चुका है। यह केस दिखाता है कि कैसे सत्ता, अफसरशाही और ठेकेदारों के गठजोड़ से करोड़ों का खेल वर्षों तक चलता रहा।

अब देखना यह होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या बिहार की जनता को कभी इस सवाल का जवाब मिलेगा कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद एक IAS अधिकारी को फिर से सत्ता के गलियारों में क्यों जगह मिली?

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