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मुंबई में बिहार भवन पर सियासी घमासान: मनसे-शिवसेना का विरोध, जदयू-भाजपा का पलटवार

मुंबई/पटना।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में प्रस्तावित बिहार भवन अब महज एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि प्रांतवाद बनाम विकास की जंग का नया अखाड़ा बन गया है। एक ओर बिहार सरकार 314.20 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक बिहार भवन के निर्माण की तैयारी में जुटी है, तो दूसरी ओर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना ने इसके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए साफ शब्दों में नारा दे दिया है—
“मुंबई में बिहार भवन मंजूर नहीं।”

बिहार सरकार को मुंबई पोर्ट ट्रस्ट से 90 साल की लीज पर एक एकड़ जमीन आवंटित की गई है। इस पर बनने वाले बिहार भवन का उद्देश्य मुंबई इलाज के लिए आने वाले बिहार के कैंसर मरीजों और उनके परिजनों को सस्ती, सुरक्षित और विश्वस्तरीय सुविधा उपलब्ध कराना बताया जा रहा है।

मनसे का हमला: बिहार में सुधार पहले, मुंबई में खर्च बाद में

मनसे ने इस परियोजना को “बाहरी एजेंडा” करार दिया है। पार्टी के नवनिर्वाचित नगरसेवक यशवंत किल्लेदार ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि
“जब बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल है, तब मुंबई में करोड़ों रुपये खर्च करना सरासर नाइंसाफी है।”
मनसे इसे मुंबई की सीमित जमीन और संसाधनों पर अनावश्यक दबाव मान रही है।

शिवसेना भी विरोध में कूदी

मनसे के सुर में सुर मिलाते हुए शिवसेना ने भी विरोध तेज कर दिया है। पार्टी नेता विनायक राउत ने तंज कसते हुए कहा—
“आज बिहार भवन, कल बीकेसी में गुजरात भवन। यह होड़ मुंबई को बोझिल बना देगी।”
शिवसेना ने इसे स्थानीय संसाधनों पर डाका और क्षेत्रीय अस्मिता से खिलवाड़ करार दिया है।

जदयू-भाजपा का जवाब: सियासी हुल्लड़बाजी

विरोध के जवाब में जदयू और भाजपा ने मोर्चा संभाल लिया है।
जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि यह परियोजना बिहार और महाराष्ट्र सरकार की आपसी सहमति से तय हुई है और किसी की “गीदड़ भभकी” से रुकने वाली नहीं है।
वहीं भाजपा ने विरोध को संकीर्ण और विभाजनकारी सोच बताया और “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के सिद्धांत का हवाला दिया।

कैसा होगा बिहार भवन

दक्षिण मुंबई के एलफिंस्टन एस्टेट में बनने वाला बिहार भवन

  • 30 मंजिला आधुनिक इमारत होगा
  • 240 बेड की डॉरमेट्री
  • ग्रीन एरिया और सोलर पैनल
  • मरीजों, परिजनों और आगंतुकों के लिए आधुनिक सुविधाएं

बिहार सरकार का दावा है कि यह भवन सिर्फ मरीजों के लिए सहारा नहीं बनेगा, बल्कि निवेश, उद्योग, सांस्कृतिक गतिविधियों और राज्य की पहचान का भी प्रमुख केंद्र होगा।

सवाल बरकरार

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या मुंबई की प्रांतवादी राजनीति इस परियोजना को रोक पाएगी, या फिर बिहार भवन सियासी शोर को चीरते हुए खड़ा होगा और एक नई बहस की नींव रखेगा?
फिलहाल, बिहार भवन को लेकर सियासी घमासान चरम पर है।

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