तेघड़ा से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाया गया मॉडल उच्च माध्यमिक विद्यालय आज पढ़ाई का केंद्र बनने के बजाय पशु चारा उगाने और गोइठा सुखाने की जगह बन चुका है।
यह स्कूल कभी इलाके के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यहां न शिक्षक हैं, न छात्र—बस खाली कमरे, टूटते बेंच-डेस्क और उजड़ता हुआ परिसर है।
ग्रामीण बताते हैं कि इस भवन का निर्माण कई साल पहले आधुनिक सुविधाओं के साथ किया गया था। प्रयोगशाला, कंप्यूटर और अन्य संसाधन भी उपलब्ध कराए गए थे। उम्मीद थी कि यहां पढ़ाई शुरू होगी और आसपास के बच्चों को दूर नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भवन तैयार होने के बाद भी यहां कभी नियमित कक्षाएं शुरू नहीं हो सकीं।
समय बीतता गया और लापरवाही बढ़ती गई। आज हालत यह है कि स्कूल का परिसर खाली पड़ा है और वहां पशु बांधे जा रहे हैं। खाली जमीन पर चारा उगाया जा रहा है और कमरों में रखे सामान धीरे-धीरे खराब हो चुके हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर इस स्कूल को चालू कर दिया जाता, तो आसपास के कई वार्डों और पंचायतों के बच्चों को बड़ी राहत मिलती। उन्हें पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता।
ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई, यहां तक कि शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों तक बात पहुंचाई गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
यह मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि उस सोच का है, जहां योजनाएं बनती हैं, पैसे खर्च होते हैं, लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य रहता है। सवाल यही है—आखिर कब खुलेगी जिम्मेदारों की नींद?
अजय शास्त्री की रिपोर्ट














