नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल-गैस आपूर्ति पर मंडराते संकट के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए पूरे देश में ESMA (आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून) लागू कर दिया है।
इस फैसले के बाद अब स्वास्थ्य, बिजली, पानी, परिवहन और ऊर्जा जैसी जरूरी सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए हड़ताल करना गैरकानूनी माना जाएगा। सरकार का साफ कहना है कि देश की जरूरी सेवाओं को किसी भी हालत में ठप नहीं होने दिया जाएगा।
पश्चिम एशिया तनाव का असर
दरअसल हाल के दिनों में ईरान–इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल मचा दी है। समुद्री मार्गों पर संभावित संकट की वजह से तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
ऐसे हालात को देखते हुए सरकार ने एहतियातन सख्त कदम उठाते हुए ESMA लागू किया है, ताकि ऊर्जा और परिवहन जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं की आपूर्ति में कोई बाधा न आए।
क्या है ESMA कानून
ESMA यानी Essential Services Maintenance Act कोई नया कानून नहीं है। यह कानून 1968 में संसद द्वारा पारित किया गया था।
इस कानून का उपयोग उन परिस्थितियों में किया जाता है, जब आवश्यक सेवाओं में हड़ताल से आम लोगों के जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
- इस कानून के तहत अधिकतम 6 महीने तक हड़ताल पर रोक लगाई जा सकती है।
- अगर कोई कर्मचारी या संगठन इसके बावजूद हड़ताल करता है, तो उसे गैरकानूनी माना जाएगा।
- पुलिस को ऐसे मामलों में बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार भी होता है।
रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने का निर्देश
सूत्रों के मुताबिक सरकार ने पहले ही देश की तेल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दे दिए हैं। इसके लिए ESMA के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सरकार का मकसद साफ है कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ते हैं और आयात प्रभावित होता है, तब भी देश में रसोई गैस की कमी न होने पाए।
एलपीजी उत्पादन बढ़ाने पर जोर
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास तेल शोधन की पर्याप्त क्षमता है, लेकिन एलपीजी का घरेलू उत्पादन सीमित है। ऐसे में सरकार चाहती है कि रिफाइनरियां ज्यादा से ज्यादा एलपीजी तैयार करें, ताकि आम लोगों की रसोई पर कोई संकट न आए।
कुल मिलाकर सरकार ने यह साफ संकेत दे दिया है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए जरूरी सेवाओं को हर हाल में चालू रखना उसकी प्राथमिकता है। अब देखना होगा कि यह सख्त कदम संभावित ऊर्जा संकट के असर को कितना नियंत्रित कर पाता है।























