पटना। बिहार की सियासत इन दिनों दिलचस्प लेकिन जटिल दौर से गुजर रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारतीय जनता पार्टी अब तक मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर चुप्पी क्यों साधे हुए है। क्या यह रणनीतिक देरी है या फिर अंदरखाने चल रही गहरी सियासी गणित का हिस्सा?
दरअसल, भाजपा के सामने सिर्फ अपना नेता चुनने की चुनौती नहीं है, बल्कि एक ऐसा चेहरा तलाशने की भी है जो नीतीश कुमार का विकल्प बन सके। यही वजह है कि मामला आसान नहीं दिख रहा।
गठबंधन की मजबूरी और रणनीति
एनडीए की राजनीति में भाजपा पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। हर बड़ा फैसला सहयोगी दलों की सहमति से ही संभव है। ऐसे में मुख्यमंत्री का चेहरा तय करना और भी जटिल हो जाता है।
सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है जिसमें चार प्रमुख गुण हों—साफ छवि, मजबूत नेतृत्व क्षमता, जदयू को साधने की समझ और बिहार के जातीय समीकरण में फिट बैठने की योग्यता। लेकिन इन सभी मानकों पर खरा उतरने वाला चेहरा मिलना आसान नहीं हो रहा।
नीतीश फैक्टर सबसे अहम
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर अंतिम फैसला कहीं न कहीं नीतीश कुमार की सहमति पर ही निर्भर करेगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब नीतीश भाजपा से नाराज़ हुए हैं, पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है।
ऐसे में यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि अगर नीतीश मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं, तो उनकी पहली शर्त यही हो सकती है कि अगला सीएम उनकी पसंद का हो।
बदलते समीकरण
हाल के दिनों में नीतीश कुमार और भाजपा के बीच रिश्तों में नरमी देखने को मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनका सार्वजनिक सम्मान इसके संकेत देता है। हालांकि, इसके बावजूद जदयू और नीतीश की अपनी सियासी सीमाएं और प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।
नीतीश की सबसे बड़ी चिंता जदयू का भविष्य और उसका सियासी वजूद है। अगर उन्हें पार्टी के कमजोर पड़ने का अंदेशा हुआ, तो वे अपने राजनीतिक विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे फैसला टल भी सकता है।
भाजपा की दुविधा
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ संघ की पसंद और दूसरी तरफ नीतीश की सहमति। इस संतुलन को साधना आसान नहीं है।
अतीत में अटल बिहारी वाजपेई, लाल कृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली जैसे नेताओं के साथ नीतीश के बेहतर रिश्ते इस बात की मिसाल रहे हैं कि राजनीतिक संतुलन कैसे साधा जाता है।
फिलहाल बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां हर कदम सोच-समझकर रखा जा रहा है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस सियासी पहेली को कैसे सुलझाती है और राज्य को अगला मुख्यमंत्री कब मिलता है।














