बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला इतना दर्दनाक है कि इसे सिर्फ लापरवाही कहना भी कम लगता है। जमुई जिले में एक एम्बुलेंस, जो किसी की जान बचाने के लिए दौड़ती है, वही एक मरीज की मौत की वजह बन गई।
जानकारी के मुताबिक, झाझा प्रखंड के बाबूबांक गांव निवासी धीरज रविदास की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। पहले उन्हें स्थानीय रेफरल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन हालत गंभीर होने पर उन्हें जमुई सदर अस्पताल भेजा गया। यहां भी जब सुधार नहीं हुआ तो डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर कर दिया।
यहीं से शुरू हुई लापरवाही की वह कड़ी, जिसने एक परिवार को बर्बाद कर दिया। 102 एम्बुलेंस से मरीज को पटना ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही गाड़ी का ईंधन खत्म हो गया। सिकंदरा-शेखपुरा रोड पर एक गांव के पास एम्बुलेंस रुक गई और फिर आगे नहीं बढ़ सकी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि न तो एम्बुलेंस में पर्याप्त ईंधन था और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था। ड्राइवर के पास कार्ड होने के बावजूद तेल नहीं मिल पाया—और इसी बीच मरीज की हालत लगातार बिगड़ती रही।
भीषण गर्मी और सड़क किनारे खड़ी एम्बुलेंस के अंदर मरीज करीब दो घंटे तक तड़पता रहा। परिजन मदद के लिए इधर-उधर गुहार लगाते रहे, लेकिन न कोई दूसरी गाड़ी पहुंची और न ही सिस्टम से कोई राहत मिली। आखिरकार, इलाज के इंतजार में ही धीरज रविदास ने दम तोड़ दिया।
इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या एम्बुलेंस सेवा इतनी लापरवाह हो चुकी है कि बिना ईंधन के मरीज को सफर पर भेज दिया जाए? क्या किसी की जान की कीमत सिर्फ कागजी प्रक्रियाओं तक सीमित रह गई है?
मृतक के परिजनों ने इसे सीधा-सीधा घोर लापरवाही बताया है और जिम्मेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि अगर समय पर व्यवस्था होती, तो शायद जान बच सकती थी।
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है। अब देखना यह है कि इस मामले में जिम्मेदारी तय होती है या फिर यह भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।














