पटना हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी मृतक कर्मचारी के परिवार में पहले से कोई कमाने वाला सदस्य मौजूद है और उसकी आय से परिवार का भरण-पोषण संभव है, तो ऐसे मामलों में नौकरी का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस पार्थ सारथी की एकलपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने सिट्टू कुमार की याचिका को खारिज करते हुए बेगूसराय जिला अनुकंपा समिति के फैसले को सही ठहराया।
मामले के अनुसार, सिट्टू कुमार ने अपने पिता स्वर्गीय बिनोद शर्मा, जो बीएसएपी में हवलदार थे और 10 मार्च 2016 को उनका निधन हो गया था, के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनका बड़ा भाई सचिन कुमार अलग रह रहा है और उसकी आय परिवार के लिए उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन्हें नौकरी दी जानी चाहिए।
हालांकि, सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बड़ा भाई जेल पुलिस में वार्डन के पद पर कार्यरत है और नियमित वेतन प्राप्त कर रहा है। इस पर कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया और पाया कि परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आय मौजूद है।
इससे पहले भी हाईकोर्ट ने 2022 में बिहार पुलिस के डीजीपी को निर्देश दिया था कि इस मामले पर पुनर्विचार किया जाए, खासकर नीरज कुमार मलिक बनाम बिहार राज्य के फैसले के आलोक में। इसके बाद जिला अनुकंपा समिति ने 28 जुलाई 2023 को फिर से सुनवाई कर आवेदन को खारिज कर दिया था।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारना होता है, न कि इसे अधिकार के रूप में लिया जा सकता है।
इस आधार पर कोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और साफ संकेत दिया कि ऐसे मामलों में वास्तविक आर्थिक जरूरत को ही प्राथमिकता दी जाएगी।














