कर्नाटक हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी: धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों पर रोक नहीं, शंकराचार्य जयंती को बताया सम्मानित परंपरा
कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश जरूर है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि देश की पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है और इन्हें प्रतिबंधित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जस्टिस अरुण ने कहा कि संबंधित नगर निगम यह बताने में विफल रहा कि ऑडिटोरियम के उपयोग को लेकर कोई स्पष्ट नियम या दिशा-निर्देश मौजूद हैं या नहीं। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि जब तक स्पष्ट नियम न हों, तब तक किसी कार्यक्रम को मनमाने तरीके से रोका नहीं जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में आदि शंकराचार्य के महत्व को भी रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि शंकराचार्य देश के सबसे सम्मानित आचार्यों में से एक हैं और उनका अद्वैत दर्शन भारतीय दार्शनिक परंपरा की प्रमुख धारा है। ऐसे में शंकराचार्य जयंती को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आयोजन के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने आगे कहा कि भारतीय सभ्यता की महानता उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में निहित है। इन पर रोक लगाने की कोशिश देश की आत्मा को कमजोर करने जैसा होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म से जुड़े सांस्कृतिक उत्सवों को अवैध या असंवैधानिक करार देना सही नहीं है।
इस टिप्पणी को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। कोर्ट के इस रुख से यह संकेत मिलता है कि संविधान के दायरे में रहते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को संरक्षण मिलना चाहिए।














