अक्सर कहा जाता है कि “बिल्ली दूध पी गई”, लेकिन बिहार से सामने आया यह मामला उस कहावत को भी पीछे छोड़ देता है। यहां तो दावा किया गया कि रिश्वत के सबूत ही चूहों ने चट कर लिए!
मामला साल 2014 का है, जब एक महिला बाल विकास कार्यक्रम अधिकारी पर ₹10,000 की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन फरवरी 2025 में पटना हाईकोर्ट ने फैसला पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया।
जब केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो रिकॉर्ड में दर्ज एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया—मालखाने में रखे गए रिश्वत के नोट चूहों ने कुतर दिए, क्योंकि वहां की हालत बेहद जर्जर थी।
यह दलील सुनकर सुप्रीम कोर्ट की बेंच भी हैरान रह गई। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि:
“नोट नष्ट होने की यह कहानी नाकाबिले-यकीन है।”
अदालत ने इस लापरवाही को गंभीर मानते हुए सवाल उठाया कि आखिर राज्य के मालखानों में सबूत कितने सुरक्षित हैं? कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया और सरकारी राजस्व के साथ खिलवाड़ करार दिया।
हालांकि फिलहाल आरोपी अधिकारी को जमानत मिल गई है, लेकिन इस पूरे मामले ने बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल
अगर सबूत ही सुरक्षित नहीं हैं, तो न्याय की गारंटी कैसे होगी?
यह मामला सिर्फ “चूहों” की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की उस लापरवाही का आईना है, जो आम आदमी के न्याय के भरोसे को कमजोर कर रही है।














