Begusarai के नगर थाना क्षेत्र स्थित स्टेशन रोड पर हुई चोरी की घटना अब सिर्फ एक क्राइम नहीं, बल्कि सिस्टम की पोल खोलती कहानी बन चुकी है। पीड़ित महिला ने हिम्मत करके थाना पहुंचकर आवेदन दिया — बदले में मिला क्या? FIR संख्या 204/26 का मौखिक प्रसाद, लेकिन कागज़? वो शायद सिस्टम की “गोपनीय फाइलों” में ही सुरक्षित है!
कानून कहता है कि FIR की कॉपी देना अनिवार्य है, लेकिन यहां लगता है नियम सिर्फ किताबों में ही लागू होते हैं। जमीन पर तो “बोलकर बता देना ही काफी है” वाला नया मॉडल चल रहा है।
घटना के कई दिन बीत गए, लेकिन जांच की रफ्तार ऐसी है कि कछुआ भी शर्म से पानी-पानी हो जाए। न कोई गिरफ्तारी, न कोई ठोस सुराग — बस खामोशी, जो बहुत कुछ कह रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि Satish Kumar Himanshu के नेतृत्व में नगर थाना शायद “देखो और भूल जाओ” नीति पर काम कर रहा है। सवाल सीधा है — अगर एक महिला फरियादी को भी इस तरह टाला जाएगा, तो बाकी लोग न्याय की उम्मीद किससे करें?
अब बात उस बड़े वादे की — ‘क्राइम पर जीरो टॉलरेंस’। Samrat Choudhary के बयान मंचों पर खूब गूंजते हैं, लेकिन बेगूसराय की गलियों में उसका साउंड शायद म्यूट पर है। यहां तो हाल ये है कि अपराध भी हुआ, FIR भी दर्ज हुई, और कार्रवाई भी… कहीं रास्ते में ही खो गई।
तो क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ का मतलब अब ‘जीरो एक्शन’ हो गया है?
या फिर आम जनता को यही समझ लेना चाहिए कि न्याय भी अब “ऑप्शनल सर्विस” बन चुका है?
अब देखना यह है कि ऊपर बैठे अधिकारी इस मामले को नोटिस लेते हैं या फिर यह फाइल भी सिस्टम के धूल भरे कोनों में आराम फरमाती नजर आएगी।
अजय शास्त्री की रिपोर्ट
















