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महंगाई और कमजोर मांग से बिहार की अर्थव्यवस्था पर दबाव, जीएसटी संग्रह में गिरावट ने बढ़ाई चिंता

पटना। पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष और उसमें अमेरिका की सक्रिय भूमिका का असर अब बिहार की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और ऊर्जा बाजार में बढ़ी अस्थिरता ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब और बाजार की गतिविधियों पर पड़ा है।

बढ़ती महंगाई और स्थिर आय के कारण उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता कमजोर हुई है। परिणामस्वरूप राज्य में उपभोग घट रहा है, जिसका असर जीएसटी संग्रह पर भी देखने को मिल रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में मांग की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में आय संकट ने आर्थिक गतिविधियों को धीमा कर दिया है।

अर्थशास्त्री प्रो. रामानंद पाण्डेय के अनुसार, जब आमदनी स्थिर रहती है और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो लोग गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने लगते हैं। इससे बाजार में लेन-देन घटता है और कर संग्रह पर भी असर पड़ता है।

पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों ने परिवहन लागत बढ़ा दी है, जिससे लगभग हर वस्तु और सेवा महंगी हुई है। इसका असर खुदरा बाजार, मॉल, रेस्टोरेंट और सेवा क्षेत्र पर पड़ा है। पहले की तुलना में बाजारों में ग्राहकों की संख्या कम दिखाई दे रही है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जीएसटी संग्रह में कमी के पीछे केवल मांग में गिरावट ही कारण नहीं है। सितंबर 2025 में जीएसटी दरों में हुए बदलाव के तहत कई वस्तुओं को उच्च कर स्लैब से कम कर श्रेणियों में लाया गया था। इससे उपभोक्ताओं को राहत मिली, लेकिन उपभोग आधारित राज्यों के राजस्व पर दबाव बढ़ा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी चुनौतियों से जूझ रही है। पिछले वर्ष सितंबर-अक्टूबर की भारी बारिश तथा इस वर्ष मार्च-अप्रैल की बेमौसम वर्षा से किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा। गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों की पैदावार प्रभावित होने से किसानों की आय घटी है। इसका असर ग्रामीण बाजारों की खरीद क्षमता पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।

आर्थिक और राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि यदि महंगाई, कमजोर मांग और कृषि संकट का दौर लंबा खिंचता है तो बिहार की अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने बाजार में मांग बढ़ाने, ग्रामीण आय को मजबूत करने और उपभोक्ता विश्वास बहाल करने की चुनौती होगी।

हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर अप्रैल 2026 में जीएसटी संग्रह रिकॉर्ड स्तर पर रहा और इसमें सालाना वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन विभिन्न राज्यों में संग्रह की स्थिति अलग-अलग रही। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों को समझने के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

प्रो. रामानंद पाण्डेय का कहना है कि जीएसटी संग्रह में आई गिरावट यह संकेत देती है कि आर्थिक मोर्चे पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। आने वाले महीनों में सरकार को मांग बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए राहतकारी कदमों पर गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है।

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