बेगूसराय।
बेगूसराय जिले में पुलिस की कार्यशैली और प्रशासनिक संरक्षण पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर जहां अदालत ने तत्कालीन और वर्तमान थाना प्रभारी (SHO) पर महिला से मारपीट, अभद्रता और धमकी जैसे गंभीर आरोपों में prima facie मामला मानते हुए निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया है, वहीं दूसरी ओर आरोपी पुलिस अधिकारी अब भी बिना किसी कार्रवाई के अपने पद पर कार्यरत हैं।
यह मामला चकिया ओपी से जुड़ा है, जहां 21 दिसंबर 2019 की रात एक महिला के घर में जबरन घुसकर पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट, गाली-गलौज और महिला की मर्यादा भंग करने का आरोप लगाया गया था। पीड़िता राजकुमारी देवी ने तत्कालीन SHO सुमित कुमार और वर्तमान SHO राकेश कुमार गुप्ता समेत अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट ने क्या कहा?
जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश–II, बेगूसराय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि:
- महिला से मारपीट (323 IPC)
- मर्यादा भंग करने का प्रयास (354 IPC)
- अपमान (504 IPC)
- आपराधिक धमकी (506 IPC)
इन सभी धाराओं में प्रथम दृष्टया मामला बनता है और निचली अदालत द्वारा शिकायत खारिज किया जाना उचित नहीं था। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर केस को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
सबसे बड़ा सवाल: SHO अब भी कैसे तैनात?
अदालत द्वारा गंभीर धाराओं में मामला स्वीकार किए जाने के बावजूद यह सवाल उठना लाज़मी है कि—
- क्या आरोपी पुलिस अधिकारी को अब तक निलंबित क्यों नहीं किया गया?
- क्या महिला उत्पीड़न जैसे मामलों में पुलिसकर्मियों पर अलग कानून लागू होता है?
- क्या पीड़िता को न्याय दिलाने से पहले ही प्रशासन आरोपियों को बचाने में जुट गया?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आम नागरिक पर ऐसे आरोप होते, तो अब तक गिरफ्तारी हो चुकी होती, लेकिन वर्दीधारी अधिकारियों के मामले में प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
प्रशासन की चुप्पी
इस पूरे मामले में अब तक न तो पुलिस मुख्यालय की ओर से कोई स्पष्ट बयान आया है और न ही संबंधित SHO के खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई की जानकारी सामने आई है। इससे पुलिस की निष्पक्षता और महिला सुरक्षा के दावों पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
अब आगे क्या?
- केस दोबारा निचली अदालत में चलेगा
- मजिस्ट्रेट को नए सिरे से संज्ञान लेना होगा
- लेकिन जब तक आरोपी SHO पद पर बने रहेंगे, तब तक निष्पक्ष जांच पर सवाल उठते रहेंगे
यह मामला सिर्फ एक महिला का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है।


















