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सुल्तानगंज कांड: ऑफिस में गोली, जंगल में एनकाउंटर… ऐसे खत्म हुआ रामधनी यादव

भागलपुर के सुल्तानगंज से उठी गोलियों की आवाज अब सिर्फ एक वारदात नहीं रही… यह एक पूरी कहानी बन चुकी है—खौफ, सत्ता, बदला और अंत की कहानी।
जिस नाम से इलाके में दहशत कायम थी—रामधनी यादव—वह अब सिर्फ पुलिस फाइलों में दर्ज एक अध्याय बन चुका है।

सीन 1: सिविल ऑफिस में ‘एंट्री’… और सन्नाटा

मंगलवार की शाम… सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय।
कमरा भरा हुआ था—टेंडर, ठेके और पैसों की बातचीत चल रही थी।

तभी दरवाजा खुलता है…
सफेद शर्ट, खाकी हाफ पैंट… कंधे पर हरा झोला… और अंदर दाखिल होता है एक नाम—रामधनी यादव।

कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
फिर एक ठंडी आवाज गूंजती है—
“सुल्तानगंज में सिर्फ तुम ही राज करोगे क्या…?”

अगले ही पल—झोले से कट्टा निकलता है…
और गोलियों की आवाज पूरे कमरे को चीर देती है।

नगर परिषद सभापति राजकुमार गुड्डू को दो गोलियां लगती हैं…
लोग चीखते हैं… भागते हैं… अफरा-तफरी मच जाती है।

बीच-बचाव करने आते हैं कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार…
लेकिन अगली गोली सीधे उनकी जिंदगी छीन लेती है।

CCTV सब रिकॉर्ड कर रहा था… और यहीं से कहानी ने करवट ली।

सीन 2: सरेंडर… या साजिश की शुरुआत?

वारदात के कुछ घंटे बाद…
पुलिस का दबाव बढ़ता है… और अचानक खबर आती है—

रामधनी यादव खुद ऑटो से थाने पहुंचता है…
सरेंडर करता है।

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती…
यह तो सिर्फ इंटरवल था।

सीन 3: जंगल, हथियार… और ‘डबल गेम’

पुलिस को हथियार चाहिए था…
रामधनी सवालों को घुमा रहा था…

आखिरकार उसने बताया—हथियार एक सुनसान जगह छिपाया गया है।

पुलिस टीम उसे लेकर निकलती है…
अंधेरा… सन्नाटा… और एक अनजाना डर।

लेकिन रामधनी सब समझ चुका था—
अगर हथियार मिला… तो बचना नामुमकिन।

जैसे ही टीम मौके पर पहुंचती है…
अचानक—परछाइयां हिलती हैं।

पीछे छिपे उसके गुर्गे एक्टिव हो जाते हैं…
और फिर—
धांय… धांय… धांय…!

गोलियों की बौछार शुरू।

खुद रामधनी छिपाई हुई पिस्टल निकालता है…
और पुलिस पर फायरिंग शुरू कर देता है।

इस हमले में DSP नवीन, इंस्पेक्टर परमेश्वर और इंस्पेक्टर मृत्यंजय घायल हो जाते हैं।

सीन 4: जवाबी हमला… और अंत

लेकिन इस बार पुलिस तैयार थी।

जवाबी कार्रवाई होती है…
और एक गोली सीधे रामधनी के सीने में जा धंसती है।

खौफ का बादशाह…
वहीं जमीन पर गिर जाता है।

उसे तुरंत मायागंज अस्पताल ले जाया जाता है…
लेकिन डॉक्टर उसे मृत घोषित कर देते हैं।

सीन 5: एक नाम… जो डर बन गया था

रामधनी यादव—
शुरुआत दूध बेचने से…
लेकिन अंत खून-खराबे में।

  • साल 2000: कारोबारी की हत्या, सिर काटकर थाने पहुंचना
  • जेल… जमानत… फिर अपराध की दुनिया में वापसी
  • 2002-03: हत्या, लूट, रंगदारी के केस
  • राजनीति से नजदीकी
  • पत्नी नीलम देवी को पार्षद बनवाना, फिर डिप्टी चेयरमैन

धीरे-धीरे वह बन गया सुल्तानगंज का ‘अनौपचारिक शासक’—
घाट, पार्किंग, बस स्टैंड… हर जगह उसी का सिक्का चलता था।

सीन 6: अदावत… जिसने अंत लिख दिया

इस कहानी में एक और नाम था—कनबुच्चा यादव

दोनों के बीच सालों पुरानी दुश्मनी…
2023 में जानलेवा हमले…
नगर परिषद की सत्ता पर कब्जे की जंग…

कहा जाता है—
पिछले कुछ महीनों में रामधनी का साम्राज्य दरकने लगा था।

सीन 7: ‘गेम रूल’ बदल गया?

12 घंटे के अंदर एनकाउंटर…
सख्त पुलिस एक्शन…
और सियासत में बयानबाजी।

कोई कह रहा—कानून का राज
तो कोई कह रहा—एनकाउंटर कल्चर

लेकिन सुल्तानगंज की गलियों में एक ही चर्चा—
“अब खेल बदल गया है…”

आखिरी सवाल

रामधनी यादव की कहानी सिर्फ एक अपराधी के अंत की नहीं है…
यह उस सिस्टम की कहानी है—जहां अपराध, सत्ता और सियासत का गठजोड़ बनता है…

और फिर…
एक दिन गोलियों में खत्म हो जाता है।

लेकिन सवाल अब भी जिंदा है—
क्या यह अंत है… या किसी नए रामधनी की शुरुआत?

पटना से राहुल कुमार की रिपोर्ट

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