राजगीर। पुरुषोत्तम मास महापर्व के अंतर्गत आयोजित राजगीर मलमास मेले का तृतीय एवं अंतिम शाही स्नान गुरुवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के बीच संपन्न हुआ। धर्मनगरी राजगीर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। ब्रह्मकुंड में पुण्य स्नान के लिए बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
प्रशासन के अनुसार अंतिम शाही स्नान के अवसर पर करीब दो लाख श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना जताई गई थी। मेले में 14 अखाड़ों के साधु-संत, महामंडलेश्वर, महंत और नागा संन्यासियों ने भाग लिया। शंखध्वनि, जयघोष और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच निकली संतों की शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया।
ब्रह्मकुंड में स्नान के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। कई स्थानों पर लगभग दो किलोमीटर तक लोगों की लाइन लगी रही। श्रद्धालु पवित्र स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करने की कामना करते नजर आए।
हालांकि इस आध्यात्मिक आयोजन के बीच कुछ संत-महात्माओं ने व्यवस्थाओं को लेकर नाराजगी भी जाहिर की। उदासीन संप्रदाय के नागा साधुओं ने आरोप लगाया कि ब्रह्मकुंड तक पहुंचने के दौरान उन्हें अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ा। संतों के अनुसार नाना पुल के समीप उन्हें काफी देर तक रोके रखा गया, जबकि मुख्य प्रवेश द्वार पर भी संतों के जत्थे को लगभग आधे घंटे तक इंतजार करना पड़ा।
महंतों का कहना था कि प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर मौजूद रहकर संतों से संवाद स्थापित करना चाहिए था तथा शाही स्नान की व्यवस्था और मार्ग को लेकर स्पष्ट निर्देश देने चाहिए थे। उनका आरोप है कि कई कर्मियों को आवश्यक जानकारी नहीं होने के कारण भ्रम और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई। कुछ संतों ने अधिकारियों के व्यवहार पर भी आपत्ति दर्ज कराई।
वहीं दूसरी ओर कई संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं ने सुरक्षा, स्वच्छता तथा अन्य व्यवस्थाओं की सराहना भी की। बावजूद इसके अंतिम शाही स्नान के दौरान सामने आई शिकायतों ने प्रशासनिक समन्वय और प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फिलहाल लाखों श्रद्धालु ब्रह्मकुंड में स्नान कर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग ले रहे हैं। राजगीर का यह ऐतिहासिक मलमास मेला एक बार फिर आस्था, संस्कृति और सनातन परंपरा का विराट स्वरूप प्रस्तुत करता नजर आया।





















