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AIMIM ने हुमायूं कबीर से तोड़ा गठबंधन, वायरल वीडियो से बंगाल की सियासत गरमाई

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासी समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) ने आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख Humayun Kabir से अपना गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया है।

यह फैसला उस समय लिया गया जब सोशल मीडिया पर एक कथित वीडियो वायरल हुआ, जिसमें हुमायूं कबीर एक भाजपा नेता का नाम लेते हुए चुनाव में पैसे के इस्तेमाल की बात करते सुने जा रहे हैं। हालांकि इस वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इसके साथ छेड़छाड़ की आशंका भी जताई जा रही है, लेकिन इसने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गर्म कर दिया है।

वीडियो में कथित तौर पर 1000 करोड़ रुपये की डील का जिक्र सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने हुमायूं कबीर पर निशाना साधते हुए उन्हें भाजपा की “बी टीम” तक करार देना शुरू कर दिया।

वहीं Asaduddin Owaisi की पार्टी AIMIM ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 10 अप्रैल की सुबह सोशल मीडिया के जरिए गठबंधन खत्म करने की घोषणा की। पार्टी ने अपने बयान में कहा कि वह किसी भी ऐसी गतिविधि या बयान से खुद को नहीं जोड़ सकती, जिससे मुसलमानों की ईमानदारी पर सवाल उठे।

गौरतलब है कि 25 मार्च को ही हुमायूं कबीर और AIMIM के बीच गठबंधन हुआ था। उस समय इसे राज्य में तीसरे विकल्प के रूप में देखा जा रहा था, जो सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और भाजपा के बीच मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकता था।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस गठबंधन के टूटने से चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है। अब AIMIM के अकेले चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना बढ़ गई है, जिसका फायदा अन्य दलों—खासतौर पर टीएमसी—को मिल सकता है।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता करीब 27 से 30 प्रतिशत तक माने जाते हैं और लगभग 100 से अधिक सीटों पर उनका सीधा प्रभाव रहता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 44 मुस्लिम विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, जिनमें अधिकांश टीएमसी से थे।

इधर, टीएमसी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि हुमायूं कबीर को एक रणनीति के तहत मैदान में उतारा गया था, ताकि राज्य में मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोटरों में विभाजन किया जा सके। हालांकि भाजपा की ओर से इस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि AIMIM का यह फैसला चुनावी नतीजों को किस तरह प्रभावित करता है और पश्चिम बंगाल की सियासत में क्या नए समीकरण बनते हैं।

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