बिहार में इन दिनों अपराध, पुलिस कार्रवाई और सियासत के बीच तीखी टकराहट देखने को मिल रही है। राज्य में लगातार हो रहे पुलिस एनकाउंटर अब कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनते जा रहे हैं। एक ओर सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनिंदा और जातीय आधार पर की जा रही कार्रवाई बता रहा है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल के घटनाक्रमों पर कड़ा संदेश देते हुए कहा कि बच्चियों के साथ घिनौना अपराध करने वालों को “माला नहीं, बल्कि सजा की माला” पहनाई जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि राज्य में क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति लागू है और अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में एनकाउंटर जाति देखकर किए जा रहे हैं और सरकार कानून व्यवस्था सुधारने के बजाय भय और माहौल बनाने की राजनीति कर रही है।
इसी सियासी बयानबाजी के बीच बिहार पुलिस की एनकाउंटर नीति चर्चा के केंद्र में आ गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 नवंबर 2025 के बाद से अब तक राज्य में 22 एनकाउंटर की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनमें 6 अपराधियों की मौत हुई है, जबकि कई अपराधी घायल अवस्था में गिरफ्तार किए गए हैं।
भागलपुर में 29 अप्रैल को नगर परिषद अधिकारी की हत्या के आरोपी रामधनी यादव को पुलिस ने घटना के करीब 11 घंटे के भीतर एनकाउंटर में मार गिराया। वहीं 3 मई को सीवान में कुख्यात अपराधी सोनू यादव पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उस पर दिनदहाड़े हत्या करने का आरोप था।
इसके अलावा 31 दिसंबर को बेगूसराय में नक्सली दयानंद मालाकार मुठभेड़ में ढेर हुआ। 6 फरवरी को वैशाली में 300 किलो सोना लूटकांड समेत कई मामलों में वांछित अपराधी प्रिंस उर्फ अभिजीत भी पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। वहीं 17 मार्च को पूर्वी चंपारण में STF जवान की शहादत के बाद कुख्यात अपराधी कुंदन ठाकुर और प्रियांशु दुबे पुलिस कार्रवाई में मारे गए।
राज्य में तथाकथित “हाफ एनकाउंटर” यानी पैर में गोली मारकर गिरफ्तारी की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं। पटना, सीवान, छपरा, बाढ़ और वैशाली जैसे जिलों में पुलिस द्वारा लगातार की जा रही ऐसी कार्रवाइयों ने “गोली बनाम गोली” की बहस को और तेज कर दिया है।
18 मई को सीवान में अंकित कुमार सिंह के हाफ एनकाउंटर और 19 मई को पटना में 27 लाख रुपये लूटकांड के आरोपी नीतीश कुमार को पुलिस द्वारा गोली मारकर गिरफ्तार किए जाने की घटनाएं भी चर्चा में रहीं।
पुलिस प्रशासन का दावा है कि सभी एनकाउंटर आत्मरक्षा और कानूनी प्रक्रिया के तहत किए गए। अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में अपराधियों ने पहले पुलिस पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।
हालांकि मानवाधिकार संगठनों ने इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि हर पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई पूरी तरह कानून के दायरे में हुई या नहीं।
फिलहाल बिहार में अपराध और एनकाउंटर की राजनीति लगातार गरमाई हुई है। सरकार इसे सख्त कानून व्यवस्था का उदाहरण बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देख रहा है। ऐसे में जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या अपराध पर नियंत्रण का रास्ता केवल गोली की कार्रवाई से होकर गुजरता है, या फिर कानून और न्यायिक प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है।
















