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Bihar Heatwave: बिहार में भीषण गर्मी का कहर, 45°C तक पहुंच सकता है तापमान, सुपर अल-नीनो से सूखे का खतरा

बिहार इस समय भीषण गर्मी और संभावित सूखे के दोहरे संकट का सामना कर रहा है। राज्य के अधिकांश जिलों में तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है, जबकि मौसम वैज्ञानिकों ने आने वाले दिनों में हीटवेव यानी लू के और अधिक गंभीर होने की आशंका जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार इस सीजन करीब 30 दिनों तक लू का असर बना रह सकता है, जिससे जनजीवन, खेती और स्वास्थ्य पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है।

मौसम विभाग के मुताबिक पटना समेत कई जिलों में 29 मई तक तापमान 40°C से ऊपर बना रह सकता है। वहीं 27 मई को कुछ इलाकों में पारा 45°C तक पहुंचने का अनुमान है। गया, रोहतास और दक्षिण बिहार के अन्य हिस्सों में भी भीषण गर्मी लोगों की परेशानी बढ़ा रही है।

सुपर अल-नीनो बनने के संकेत

मौसम वैज्ञानिकों ने इस बार “सुपर अल-नीनो” जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई है। बताया जा रहा है कि प्रशांत महासागर के विषुवतीय क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। यदि यह तापमान सामान्य से 2°C या उससे अधिक बढ़ जाता है, तो इसे “सुपर अल-नीनो” कहा जाता है, जो एक दुर्लभ लेकिन बेहद प्रभावशाली जलवायु घटना मानी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति मई से जुलाई और फिर सर्दियों तक बनी रह सकती है। इसका सीधा असर भारत के मानसून और वर्षा प्रणाली पर पड़ता है।

कैसे प्रभावित होता है मानसून?

सामान्य परिस्थितियों में हिंद महासागर और अरब सागर से आने वाली नम और ठंडी हवाएं भारत में मानसूनी बारिश लाती हैं। लेकिन अल-नीनो के दौरान प्रशांत महासागर से उठने वाली गर्म हवाएं इन नम हवाओं को कमजोर कर देती हैं। इससे मानसून कमजोर पड़ जाता है और बारिश की मात्रा घट जाती है।

मौसम विभाग के अनुसार बिहार में मानसून इस बार 8 से 10 जून के बीच दस्तक दे सकता है, जबकि सामान्य तौर पर यह 15 जून के आसपास आता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने संकेत दिए हैं कि इस बार राज्य में सामान्य से करीब 20 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है। बिहार की औसत मानसूनी वर्षा लगभग 992.2 मिमी मानी जाती है, जो इस बार प्रभावित हो सकती है।

खेती और जलस्तर पर पड़ेगा असर

यदि सुपर अल-नीनो की स्थिति मजबूत होती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर खेती, जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। कम बारिश होने से धान और अन्य खरीफ फसलों की खेती प्रभावित हो सकती है। साथ ही भूजल स्तर में गिरावट और पेयजल संकट की आशंका भी बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय मानसून की व्यवस्था करोड़ों साल पुराने भूगर्भीय बदलावों से जुड़ी हुई है। थार मरुस्थल के गर्म होने से लो-प्रेशर सिस्टम बनता है, जिससे समुद्र से ठंडी और नम हवाएं भारत की ओर खिंचती हैं और हिमालय से टकराकर बारिश होती है। लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो मानसून कमजोर हो जाता है।

स्वास्थ्य पर भी बढ़ा खतरा

लगातार बढ़ती गर्मी और लू का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। डॉक्टरों ने लोगों को दोपहर में बाहर निकलने से बचने, अधिक पानी पीने और धूप से बचाव करने की सलाह दी है। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत बताई गई है।

फिलहाल बिहार के लोग भीषण गर्मी से राहत मिलने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के अनुमान आने वाले दिनों को और चुनौतीपूर्ण बता रहे हैं।

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