बिहार सहित पूरे देश में बुधवार को दवा कारोबार पूरी तरह प्रभावित रहा। ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में आयोजित देशव्यापी बंद के तहत बिहार की लगभग 40 हजार दवा दुकानें बंद रहीं, जिससे दवा बाजारों में सन्नाटा पसरा रहा। इस आंदोलन को थोक दवा कारोबारियों के साथ-साथ खुदरा दवा व्यापारी संघ और सेल्स रिप्रजेंटेटिव संघ का भी पूर्ण समर्थन मिला। राजधानी पटना की सबसे बड़ी दवा मंडी जीएम रोड में अधिकांश दुकानों के शटर बंद रहे और पूरे दिन कारोबार ठप नजर आया।
दवा कारोबारियों के अनुसार इस बंदी से राज्य में लाखों रुपये के कारोबार पर असर पड़ा। अनुमान लगाया जा रहा है कि करोड़ों रुपये के दवा कारोबार प्रभावित हुए, जबकि सरकार को टैक्स राजस्व में भी नुकसान उठाना पड़ा। पटना समेत राज्य के लगभग सभी जिलों में इस आंदोलन का व्यापक असर देखने को मिला।
हालांकि राहत की बात यह रही कि प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र (PMBJK) की दुकानें खुली रहीं। वहीं सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की आपूर्ति सामान्य बनी रही। स्वास्थ्य विभाग की ओर से बताया गया कि राज्य सरकार द्वारा 611 प्रकार की जरूरी दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे इमरजेंसी सेवाओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ा।
दरअसल, यह आंदोलन ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ किया गया है। दवा व्यापारियों का आरोप है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दवाओं की बिक्री अनियंत्रित तरीके से हो रही है, जिससे नकली, एक्सपायरी और बिना डॉक्टर की सलाह वाली दवाओं के वितरण का खतरा बढ़ गया है। साथ ही भारी छूट देकर ऑनलाइन कंपनियां छोटे दवा दुकानदारों के व्यवसाय को प्रभावित कर रही हैं।
बिहार केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि यह आंदोलन किसी आर्थिक लाभ या हानि के लिए नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और दवा व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने इसे “सेहत और सिस्टम के बीच की निर्णायक लड़ाई” बताया।
वहीं ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) ने पहले ही देशभर के 15 लाख से अधिक दवा विक्रेताओं को इस आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। संगठन का कहना है कि जब तक ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर सख्त नियम लागू नहीं किए जाते, तब तक आंदोलन जारी रह सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, दवा वितरण प्रणाली और डिजिटल व्यापार मॉडल पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब बहस इस बात को लेकर तेज हो गई है कि सुविधा और डिजिटल सेवाओं के नाम पर क्या मरीजों की सुरक्षा और छोटे व्यापारियों के हितों से समझौता किया जा सकता है।
















