पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव के एक बयान ने बिहार की सियासत में नया विवाद खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से जारी नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने तीखा रुख अपनाया और साफ कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं।
कटिहार में एक निजी कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में पप्पू यादव ने कहा, “ऐसे नोटिस को रद्दी में फेंक देते हैं… कौन कैसे आयोग में जाता है, यह भी हमें पता है।”
दरअसल, महिलाओं की राजनीति में भागीदारी को लेकर उनके हालिया बयान पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया था। लेकिन सफाई देने के बजाय सांसद ने आयोग की कार्रवाई को ही सिरे से खारिज कर दिया।
अपने बयान का बचाव करते हुए पप्पू यादव ने न सिर्फ अपने शब्दों पर कायम रहने की बात कही, बल्कि आयोग की भूमिका और उसकी प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए। उनका यह रुख एक स्पष्ट टकराव की स्थिति को दर्शाता है—एक तरफ संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी, तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधि का खुला विरोध।
इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि समर्थक इसे उनकी “बेधड़क बोलने की शैली” करार दे रहे हैं।
गौरतलब है कि एक दिन पहले महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर दिए गए बयान से ही बहस छिड़ चुकी थी। अब महिला आयोग के नोटिस पर इस प्रतिक्रिया ने विवाद को और भड़का दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधियों की भाषा और जिम्मेदारी की कोई सीमा तय होगी, या फिर ऐसे बयान सियासी बहस को लगातार उग्र बनाते रहेंगे?














