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बिहार विधान परिषद चुनाव में नहीं मिला मौका, क्या मंत्री पद छोड़ेंगे दीपक प्रकाश? सियासी गलियारों में तेज हुई चर्चा

पटना। बिहार विधान परिषद की नौ सीटों पर होने वाले द्विवार्षिक चुनाव और एक सीट पर उपचुनाव के लिए एनडीए द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सबसे अधिक चर्चा बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है, जिनका नाम एनडीए की घोषित उम्मीदवार सूची में शामिल नहीं है। इसके बाद उनके मंत्री पद के भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

दरअसल, दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री हैं, लेकिन वे न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मंत्री बनाए जाने के छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर संबंधित व्यक्ति को मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।

ऐसे में बिहार विधान परिषद चुनाव को दीपक प्रकाश के लिए सदन की सदस्यता हासिल करने का सबसे महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा था। हालांकि एनडीए द्वारा घोषित उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

भाजपा ने अपने कोटे से पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को उम्मीदवार बनाया है। वहीं जदयू ने निशांत कुमार, भारती मेहता, शिवरानी देवी प्रजापति तथा उपचुनाव के लिए ललन प्रसाद को मैदान में उतारा है। इन नामों की घोषणा के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि दीपक प्रकाश को इस बार विधान परिषद चुनाव में मौका नहीं मिलेगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एनडीए ने उम्मीदवार चयन में सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दी है। वहीं गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही थी। ऐसे में राष्ट्रीय लोक मोर्चा को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका।

दीपक प्रकाश, Upendra Kushwaha के पुत्र हैं और लंबे समय से उनके एमएलसी उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा चल रही थी। लेकिन अंतिम सूची में नाम नहीं आने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एनडीए नेतृत्व दीपक प्रकाश के लिए कोई वैकल्पिक राजनीतिक रास्ता निकालता है या फिर संवैधानिक बाध्यता के चलते उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। 18 जून को होने वाले विधान परिषद चुनाव से पहले यह मुद्दा बिहार की राजनीति में चर्चा और बहस का बड़ा विषय बन गया है।

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