बिहार के शिक्षा विभाग से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला मोतिहारी जिले के पताही प्रखंड स्थित उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय, बेतवना का है, जहां स्कूल विकास की रकम में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी उजागर हुई है।
आरोप है कि स्कूल में तैनात डाटा ऑपरेटर किसलय कुमार ने बेहद सुनियोजित तरीके से फर्जीवाड़ा किया। उसने हेडमास्टर और विकास समिति के सचिव के हस्ताक्षर फर्जी तरीके से तैयार कर स्कूल के खाते से करीब 1.90 लाख रुपये अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिए।
मामले की भनक लगते ही स्कूल के हेडमास्टर ने इसकी शिकायत की, जिसके बाद प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) ने जांच शुरू कराई। जांच के दौरान बैंक स्टेटमेंट और दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल की गई, जिसमें साफ हो गया कि हस्ताक्षर फर्जी थे और रकम आरोपी के खाते में गई है।
यानी मामला पूरी तरह से स्पष्ट था—गड़बड़ी हुई, सबूत मिले और आरोपी की पहचान भी हो गई। लेकिन इसके बावजूद 30 दिन बीत जाने के बाद भी FIR दर्ज नहीं होना सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि आखिर किसके संरक्षण में आरोपी अब तक कार्रवाई से बचा हुआ है। लोग इसे सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि अंदरखाने की सांठगांठ और बचाव की कोशिश मान रहे हैं।
इस बीच, संबंधित एजेंसी की ओर से आरोपी से स्पष्टीकरण मांगा गया था। जवाब नहीं मिलने पर दोबारा नोटिस जारी कर बर्खास्तगी की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई और आपराधिक कार्रवाई के बीच का यह अंतर लोगों को खटक रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जांच में गड़बड़ी साबित हो चुकी है, तो FIR दर्ज करने में देरी क्यों? क्या सिस्टम जानबूझकर धीमा किया जा रहा है, या फिर किसी प्रभाव के चलते कार्रवाई टाली जा रही है?
यह मामला सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर कब तक चुप रहता है और कब आरोपी के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाते हैं।














