“अंधेरों से डरकर जो रुक जाए वो रौशनी क्या पाएगा,
जो हिम्मत से आगे बढ़े वही इतिहास बनाएगा…”
यह कहानी बेगूसराय जिले के मटिहानी विधानसभा क्षेत्र के शाहपुर गांव निवासी रंधीर सिंह के 18 वर्षीय पुत्र प्रशांत कुमार सिंह की है। वर्ष 2017 में महज 9 वर्ष की उम्र में प्रशांत की दोनों आंखों की रोशनी चली गई। डॉक्टरों ने बताया कि वह रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा नामक बीमारी से पीड़ित है, जिसका इलाज फिलहाल संभव नहीं है। इस घटना के बाद परिवार गहरे सदमे में चला गया।
प्रशांत पढ़ाई में शुरू से ही मेधावी छात्र रहा है। आंखों की रोशनी जाने के बाद उसकी पढ़ाई रुक गई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। परिवार ने देश के कई बड़े अस्पतालों में इलाज करवाया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
इस कठिन समय में प्रशांत की बहन मुस्कान उसके लिए सबसे बड़ा सहारा बनी। मुस्कान, जो खुद नीट की तैयारी कर रही है, अपने भाई की “तीसरी आंख” बन गई। वह न सिर्फ प्रशांत की पढ़ाई में मदद करती है, बल्कि उसकी दिनचर्या का भी अहम हिस्सा बन चुकी है। प्रशांत वॉइस टाइपिंग के जरिए ऑनलाइन पढ़ाई करता है और संगीत के माध्यम से खुद को सकारात्मक बनाए रखता है।
प्रशांत की मां ममता कुमारी, जो दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान क्षेत्र के एक विद्यालय में शिक्षिका हैं, बेटे को अपने साथ दरभंगा ले आईं। यहां उत्क्रमित मध्य विद्यालय घोड़दौड़ में उसका दाखिला कराया गया। वर्ष 2026 में प्रशांत ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में बैठने की इच्छा जताई, जो स्कूल और परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती थी।
स्कूल प्रशासन ने जिला शिक्षा पदाधिकारी से विशेष अनुमति मांगी, जिसके बाद जिला प्रशासन के सहयोग से प्रशांत को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई। उसके साथ एक छात्र को राइटिंग हेल्पर के रूप में नियुक्त किया गया। परीक्षा के दौरान प्रशांत प्रश्न सुनकर उत्तर बोलता था और उसका सहायक उत्तर पुस्तिका में लिखता था।
प्रशांत के इस जज्बे और मेहनत का परिणाम तब सामने आया, जब उसने 10वीं बोर्ड परीक्षा में करीब 80 प्रतिशत अंक हासिल किए। उसकी इस सफलता ने न सिर्फ उसके परिवार, बल्कि बेगूसराय और दरभंगा जिले का नाम रोशन कर दिया।
प्रशासन ने भी प्रशांत की उपलब्धि को सराहा। बेगूसराय के जिला शिक्षा पदाधिकारी ने उसे सम्मानित करते हुए कहा कि पूरी तरह नेत्रहीन होने के बावजूद इतनी शानदार सफलता हासिल करना गर्व की बात है। साथ ही आश्वासन दिया गया कि आगे की पढ़ाई में हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी।
आज प्रशांत कुमार सिंह ने यह साबित कर दिया है कि सपने आंखों से नहीं, हौसलों से देखे जाते हैं। उसकी कहानी हर उस बच्चे के लिए प्रेरणा है, जो किसी मुश्किल के कारण अपने सपनों को छोड़ देता है।
“रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
बस चलने की हिम्मत होनी चाहिए…
मंजिल उन्हीं को मिलती है,
जिनके सपनों में जान होती है।”
अजय शास्त्री की रिपोर्ट














