सात दिनों की जेल यात्रा के बाद कांग्रेस समर्थित निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने पटना की सियासी फिज़ा में हलचल मचा दी। रिहाई के तुरंत बाद उन्होंने सीधा सवाल दागा— क्या बिहार में बेटियां महफूज हैं? क्या हक और सच की आवाज़ को दबाया जा रहा है?
उन्होंने कहा कि उनके जेल में रहने के दौरान राज्य में बच्चियों के गायब होने और जघन्य अपराधों पर सियासी खामोशी क्यों रही। “जब मैं जेल में था, तब किसी ने आवाज़ क्यों नहीं उठाई? ये मेरी शख्सी जंग नहीं, बिहार की बेटियों की लड़ाई है,” उन्होंने दो टूक कहा।
सिस्टम और सियासत पर निशाना
पप्पू यादव ने मौजूदा राजनीति को “गंदी सियासत” करार देते हुए आरोप लगाया कि जो लोग समझौते की राह पकड़ लेते हैं, उनकी गाड़ी चलती रहती है, लेकिन जो सच बोलते हैं, उन्हें निशाना बनाया जाता है। इशारों-इशारों में उन्होंने सत्ता और सिस्टम दोनों पर सवाल उठाए।
उन्होंने पटना पश्चिम के एसपी भानु प्रताप सिंह पर भी गंभीर आरोप लगाए। हालांकि विस्तार से कुछ नहीं कहा, लेकिन संकेत दिया कि जल्द ही पूरे मामले का खुलासा करेंगे।
सम्राट चौधरी के बयान पर प्रतिक्रिया
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान— “अपराधियों को मिट्टी में मिला देंगे”— पर प्रतिक्रिया देते हुए पप्पू यादव ने कहा कि बयान अच्छा है, लेकिन अपराध को जाति के चश्मे से देखना बंद कीजिए। “अपराधी की कोई जाति नहीं होती,” उन्होंने कहा।
पप्पू यादव ने अपने समर्थन में खड़े नेताओं—का आभार जताया।
उन्होंने संकेत दिया कि कुछ पुराने चर्चित हत्याकांडों और कथित फर्जी एनकाउंटर मामलों पर वे बड़ा खुलासा करेंगे और जरूरत पड़ी तो हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाएंगे।
क्या बनेगा बड़ा चुनावी मुद्दा?
उनके तेवर और लहजे से साफ था कि बेटियों की सुरक्षा के मुद्दे पर वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। अब देखना होगा कि उनकी यह सियासी हुंकार बिहार की राजनीति में कितना असर डालती है और क्या ‘बेटियों की सुरक्षा’ आने वाले दिनों में बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है।















