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दरिंदगी की चार्जशीट: पोस्टमॉर्टम ने खोली ‘सुसाइड’ थ्योरी की पोलपटना में NEET छात्रा से रेप के बाद हत्या, पुलिस–अस्पताल की भूमिका कठघरे में

पटना।
पटना में NEET की छात्रा की मौत अब किसी संदिग्ध हालात की कहानी नहीं रही। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने इसे रेप के बाद हत्या की खुली चार्जशीट में बदल दिया है। शुरुआती जांच में जिस यौन शोषण से पुलिस इनकार करती रही, वही सच्चाई अब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में स्याह अक्षरों में दर्ज है। रिपोर्ट बताती है कि छात्रा ने डेढ़ से दो घंटे तक जान बचाने के लिए संघर्ष किया—उसके शरीर पर दर्ज जख्म इस बर्बरता की गवाही दे रहे हैं।

मौत से पहले जुल्म, हर जख्म बना सबूत
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में गठित मेडिकल बोर्ड के अनुसार, छात्रा के शरीर पर पाई गई सभी चोटें मौत से पहले की हैं। गर्दन और कंधे के आसपास अर्धचंद्राकार नाखूनों के गहरे निशान, छाती व कंधों के नीचे फैली खरोंचें और पीठ पर नीले निशान बताते हैं कि यह कोई अचानक बिगड़ी हालत नहीं, बल्कि सुनियोजित और लंबा अपराध था। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे निशान तब बनते हैं जब पीड़िता पूरी ताकत से प्रतिरोध करती है—यह साफ संकेत है कि छात्रा बेहोश नहीं थी, बल्कि आखिरी सांस तक लड़ी।

जननांग परीक्षण ने किया रेप की पुष्टि
सबसे संगीन खुलासा जननांग परीक्षण में हुआ। रिपोर्ट में ताजा चोटें, गहरी रगड़, टिशू ट्रॉमा और भारी ब्लीडिंग दर्ज है। मेडिकल बोर्ड की राय दो टूक है—ये चोटें सहमति से बने संबंध की नहीं, बल्कि जबरन प्रवेश का परिणाम हैं। डॉक्टरों ने साफ लिखा है कि यदि सहमति होती, तो शरीर के अन्य हिस्सों पर इतने व्यापक संघर्ष के निशान नहीं मिलते। रिपोर्ट के आधार पर यह आशंका भी जताई गई है कि एक से अधिक लोग दरिंदगी में शामिल हो सकते हैं।

पुलिस बनाम पोस्टमॉर्टम—कौन गलत?
यहां पुलिस के शुरुआती बयान और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आमने-सामने खड़े हैं। पुलिस ने कहा था—यौन शोषण के सबूत नहीं, छात्रा बेहोश थी, मामला अचानक बिगड़ी हालत का है। जबकि पोस्टमॉर्टम कहता है—सभी चोटें मौत से पहले की, दर्जनों संघर्ष के निशान और यौन हिंसा की पुष्टि। सवाल उठता है कि जब फॉरेंसिक हकीकत इतनी साफ थी, तो शुरुआती जांच में इनकार क्यों किया गया?

साजिश की बू, ‘डील’ के आरोप
परिवार का आरोप है कि हॉस्टल संचालक ने पैसों के बदले समझौते की पेशकश की। अगर मामला साफ था, तो डील क्यों? पूछताछ के बाद तीन संदिग्धों को छोड़ देना—क्या यह सबूतों की कमी थी या दबाव का नतीजा? परिजन आशंका जता रहे हैं कि वारदात में जान-पहचान वाला शामिल हो सकता है—क्या इस एंगल पर पूरी तह तक जांच हुई?

मामा के आरोप: पहले ही घोषित कर दी ‘आत्महत्या’
मृतका के मामा सुभाष कुमार ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि 11 तारीख को मौत से पहले ही पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे आत्महत्या बता दिया। पुलिस ने कमरे से नींद की 90 गोलियां मिलने का दावा किया—जबकि बिना डॉक्टर की सलाह इतनी बड़ी मात्रा में दवा मिलना सवालों के घेरे में है। मामा ने इसे ‘गैंगरेप और हत्या’ बताते हुए आरोप लगाया कि मामले को दबाने की कोशिश हुई।

15 लाख का ऑफर, डॉक्टर–पुलिस पर उंगली
परिजनों ने हॉस्टल मालिक के साथ-साथ अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय पुलिस अधिकारियों पर भी आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि केस रफा-दफा करने के लिए 15 लाख रुपये तक का ऑफर दिया गया। भरोसा टूटने के बाद परिवार अब CJM कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा है।

एसएसपी की ‘नींद की गोली’ थ्योरी कटघरे में
पोस्टमॉर्टम के बाद ‘नींद की गोली और सुसाइड’ की थ्योरी खुद सवालों के कटघरे में खड़ी है। बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आए मोबाइल सर्च हिस्ट्री और ओवरडोज की कहानी क्यों परोसी गई? क्या छात्रा के जिस्म पर मौजूद जख्म किसी को नजर नहीं आए? बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद द्वारा उठाए गए सवालों ने भी पुलिस महकमे की पेशानी पर बल डाल दिए हैं—गलत इनपुट दिया गया या अधूरी जांच पर बयानबाजी हुई?

अब जांच का दायरा बढ़ा, पर भरोसा?
घटना के बाद सिस्टम हरकत में आया है। एसएसपी से लेकर डीजीपी तक ने जांच का दायरा बढ़ाने की बात कही है। मोबाइल फोरेंसिक, CCTV फुटेज और FSL रिपोर्ट का इंतजार है। शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मालिक की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन सवाल बाकी हैं—क्या एक गिरफ्तारी काफी है? क्या दबाव में सच छुपाया गया? और क्या थाने से ऊपर तक गलत कहानी पहुंचाई गई?

सवाल वही—न्याय मिलेगा या फाइलों में दफन?
पोस्टमॉर्टम ने दरिंदगी की परतें उधेड़ दी हैं। अब देखना यह है कि जांच सच तक पहुंचती है या यह मामला भी फाइलों की अंधेरी अलमारी में दफन कर दिया जाएगा। बिहार की एक बेटी की आखिरी लड़ाई, अब सिस्टम की परीक्षा बन चुकी है।

पटना से राहुल कुमार की रिपोर्ट

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