जहानाबाद में नीट छात्रा के लिए इंसाफ़ की मांग अब फाइलों से निकलकर सड़कों तक आ गई है। पतियवा गांव से शुरू हुई यह न्याय यात्रा जहानाबाद समाहरणालय तक बढ़ी, जहां सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय लोग और पीड़ित परिवार के समर्थक एक सुर में हक़ और इंसाफ़ की गुहार लगाते दिखे।
काले झंडों के साए में निकला यह विरोध मार्च अपराध के खिलाफ़ एक खुला ऐलान था कि अब चुप्पी नहीं, जवाब चाहिए। करीब 35 किलोमीटर की पैदल यात्रा में शामिल लोगों ने लगातार नारेबाज़ी की, जैसे “दोषियों को सज़ा दो”, “कानून की हिफ़ाज़त करो”, “इंसाफ़ से समझौता नहीं।”
प्रदर्शनकारियों का मक़सद साफ़ था: नीट छात्रा के मामले में जिन लोगों ने कानून को ठेंगा दिखाया, उन्हें कानून के शिकंजे में लाना। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि सरकार प्रभावशाली गुनहगारों को बचाने और केस को दबाने की कोशिश कर रही है। उनकी माने तो तफ्तीश की रफ़्तार सुस्त है, गिरफ़्तारियां नहीं हुई हैं और जवाबदेही धुंधली है।
इस दौरान एक गंभीर आरोप भी सामने आया कि बिहार के डीजीपी कार्यालय में पीड़ित माता-पिता पर आत्महत्या मानने का दबाव डाला गया। प्रदर्शनकारियों ने इसे शर्मनाक बताया और कहा कि ऐसे प्रयास पुलिस और सत्ता की नीयत पर काले साए डालते हैं।
जुलूस के दौरान महिलाएं, बुज़ुर्ग और युवा एक साथ न्याय की आवाज़ उठाते रहे। सवाल हर ज़ुबान पर था: “क़ानून कब बोलेगा?” प्रदर्शनकारियों ने ऐलान किया कि जब तक पीड़ित परिवार को इंसाफ़ नहीं मिलेगा, आंदोलन थमेगा नहीं। चाहे कितनी भी लीपापोती क्यों न हो, वे हक़ की लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाएंगे।
न्याय यात्रा अंत में डीएम कार्यालय पहुँची, जहां ज्ञापन सौंपने की तैयारी है। संदेश दो टूक है: अगर इंसाफ़ में देर हुई, तो यह देरी खुद एक नया जुर्म बन जाएगी।















