एक ओर अमेरिका–ईरान तनाव के बीच खाड़ी क्षेत्र में सैन्य हलचल तेज है, वहीं भारत ने हिंद महासागर में कूटनीतिक शतरंज की ऐसी चाल चली है, जिसकी गूंज वैश्विक स्तर पर सुनाई दे रही है। विशाखापट्टनम के समुद्र में 70 से अधिक देशों के युद्धपोत लंगर डाले खड़े हैं—इनमें रूस, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी प्रमुख शक्तियां शामिल हैं।
यह सिर्फ सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि तीन बड़े आयोजनों का संगम है—अंतर्राष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा 2026 (IFR 2026), मिलन अभ्यास 2026 और हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी प्रमुखों का सम्मेलन। 15 से 24 फरवरी तक चल रहे इस मेगा इवेंट में 72 देशों की भागीदारी और 60 से ज्यादा युद्धपोतों की मौजूदगी एक स्पष्ट संदेश देती है—भारत अब वैश्विक समुद्री कूटनीति का भरोसेमंद मंच बन चुका है।
‘मिलन 2026’ का उद्घाटन राजनाथ सिंह ने किया। इसकी कमान भारतीय नौसेना के पूर्वी नौसेना कमान मुख्यालय से संभाली जा रही है।
इस दौरान 76% स्वदेशी तकनीक से लैस विमानवाहक पोत INS Vikrant की समुद्री सलामी ने सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरीं। स्वदेशी फ्रिगेट, विध्वंसक, पनडुब्बी रोधी कॉरवेट और सबमरीन की तैनाती सिर्फ ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ‘समुद्री आत्मनिर्भरता’ का ऐलान है। यह संकेत भी साफ है कि नौसेना का बजट अब घरेलू रक्षा निर्माण की ओर तेजी से मुड़ रहा है।
भारत की 11,000 किमी लंबी तटरेखा, 1,300 से अधिक द्वीप—अंडमान-निकोबार से लक्षद्वीप तक—और 95% समुद्री व्यापार पर निर्भरता बताती है कि हिंद महासागर में स्थिरता क्यों अनिवार्य है।
सियासत की बिसात पर यह ‘समुद्री होली’ दर्शाती है कि जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी दिखे, तब भी भारत संवाद, संतुलन और सहयोग का सेतु बन सकता है।


















