हफ्ते के पहले कारोबारी दिन सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। 18 मई को रुपया गिरकर 96.17 प्रति डॉलर पर आ गया, जबकि कारोबार के दौरान यह 96.18 तक भी फिसल गया।
रुपये में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कच्चा तेल 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव बनता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए गए सख्त बयान के बाद वैश्विक बाजारों में डर और अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों में निवेश कर रहे हैं, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा है।
रुपये की कमजोरी का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। विदेश में पढ़ाई, मेडिकल इलाज और अंतरराष्ट्रीय यात्रा महंगी हो सकती है। इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे आयातित उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
डॉलर महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ने की आशंका है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं और महंगाई पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक तनाव इसी तरह बढ़ते रहे, तो आने वाले दिनों में रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।


















