पटना, बिहार:
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए जैसे-जैसे राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे नेताओं के बीच बयानबाज़ी भी तेज़ होती जा रही है। शुक्रवार को एनडीए ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपना संयुक्त घोषणापत्र (Common Manifesto) जारी किया, लेकिन कांग्रेस ने इस कार्यक्रम की अवधि और शैली को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कांग्रेस के पर्यवेक्षक और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पटना में प्रेस से बात करते हुए एनडीए के नेताओं पर तीखा वार किया। उन्होंने कहा कि घोषणापत्र जारी करने का कार्यक्रम महज 26 सेकंड का रहा — जो लोकतंत्र के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।
अशोक गहलोत ने कहा,
“जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अन्य नेता सिर्फ 26 सेकंड के लिए मंच पर आए। मीडिया वालों ने मुझे बताया कि उन्होंने पहली बार इतना छोटा प्रेस कॉन्फ्रेंस देखा है। वे डर गए और भाग गए। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।”
गहलोत ने कहा कि चुनावों के दौरान घोषणापत्र जारी करना किसी भी दल के लिए जनता के प्रति जवाबदेही का प्रतीक होता है। लेकिन अगर एनडीए के शीर्ष नेता मीडिया और सवालों से बच रहे हैं, तो यह इस बात का सबूत है कि वे अपने ही वादों पर भरोसा नहीं करते।
उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए गठबंधन में लोकतांत्रिक मूल्यों की कमी है।
“अगर नेताओं में आत्मविश्वास होता, तो वे पत्रकारों के सवालों का सामना करते और जनता को बताते कि वे बिहार के लिए क्या करने जा रहे हैं। लेकिन वे डर के माहौल में भागे, यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं,” गहलोत ने कहा।
कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि लोकतंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता ही किसी सरकार या गठबंधन की असली ताकत होती है। लेकिन एनडीए का यह रवैया दर्शाता है कि वे जनता के बीच अपनी उपलब्धियों या नीतियों को लेकर असहज हैं।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि बिहार की जनता अब जागरूक है और केवल नारों या प्रचार से प्रभावित नहीं होगी। जनता ऐसे नेताओं को चुनना चाहती है जो संवाद करें, जवाब दें और लोकतंत्र की मर्यादा का पालन करें।
इधर, बिहार में जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर और भी तेज़ हो गया है। एनडीए और महागठबंधन दोनों ही एक-दूसरे पर वादाखिलाफी, भ्रष्टाचार और अवसरवादिता के आरोप लगा रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि एनडीए के घोषणापत्र को लेकर अशोक गहलोत का यह हमला चुनावी नैरेटिव को नया मोड़ दे सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर एनडीए की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।















