बिहार विधान सभा में आरक्षण की सीमा 85 प्रतिशत करने की मांग को लेकर बुधवार को सदन में जोरदार हंगामा हुआ। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक रणविजय साहू ने इस मुद्दे पर कार्यस्थगन प्रस्ताव पेश किया, जिसे अध्यक्ष ने अस्वीकार कर दिया।

क्या है पूरा विवाद?
रणविजय साहू ने कहा कि महागठबंधन सरकार के दौरान जाति सर्वे रिपोर्ट आने के बाद दोनों सदनों में आरक्षण को बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की बात कही गई थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल नहीं किए जाने के कारण मामला लंबित है। अब विपक्ष 85 प्रतिशत तक आरक्षण बढ़ाने की मांग उठा रहा है।
कार्यस्थगन प्रस्ताव खारिज, विपक्ष का वॉकआउट
प्रस्ताव अस्वीकार होने के बाद राजद और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक आक्रोशित हो गए। विपक्षी सदस्य वेल में पहुंचकर नारेबाजी करने लगे।
सदन में “आरक्षण विरोधी सरकार हाय-हाय” और “मुर्दाबाद” के नारे गूंजे।
स्थिति बिगड़ती देख विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

सरकार का पलटवार
हंगामे के बीच मंत्री अशोक चौधरी ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होता है और विपक्ष इसे खो चुका है, इसलिए वे 25 सीटों पर सिमट गए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जब विपक्ष की सरकार थी, तब वे कर्पूरी ठाकुर द्वारा दिए गए अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के आरक्षण को समाप्त करना चाहते थे।
सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक सीमा
विपक्ष लगातार आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग दोहराता रहा और सरकार पर सामाजिक न्याय के मुद्दे पर संवेदनहीन होने का आरोप लगाया। वहीं सरकार का कहना है कि संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
आरक्षण के मुद्दे पर सदन में टकराव ने बिहार की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है। अब देखना होगा कि यह मुद्दा आगे किस दिशा में बढ़ता है।

















