नई दिल्ली: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत दर्ज एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कानून की स्पष्ट सीमा निर्धारित की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की खंडपीठ ने कहा कि आपसी सहमति से लंबे समय तक चले प्रेम संबंधों को बाद में “धोखाधड़ी” की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 69 केवल उन मामलों में लागू होती है जहां आरोपी की मंशा शुरू से ही छल या धोखे की हो, न कि उन मामलों में जहां परिस्थितिवश शादी नहीं हो पाई।
मामले का विवरण
मामला नीलेश राम चंद्रानी द्वारा दायर याचिका का था। तथ्यों के अनुसार:
- नीलेश और शिकायतकर्ता महिला की मुलाकात एलएलएम की पढ़ाई के दौरान हुई थी।
- वर्ष 2020 से दोनों के बीच आपसी प्रेम संबंध थे।
- जून 2023 में औपचारिक रूप से सगाई हुई और नवंबर 2024 में शादी की तारीख तय की गई।
- शादी की तैयारियों में होटल बुकिंग, कार्ड छपाई और फोटोग्राफर तक तय थे।
हालांकि बाद में किसी कारणवश शादी टूट गई। इसके बाद महिला ने नोएडा सेक्टर 63 थाने में नीलेश के खिलाफ धारा 352 (शांति भंग), 351(2) (धमकी) और धारा 69 (शादी का झूठा वादा) के तहत FIR दर्ज कराई।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में शादी का वादा शुरू से झूठा नहीं था। सगाई और शादी की तैयारियां यह प्रमाणित करती हैं कि याची का इरादा वास्तव में शादी करने का था, न कि सिर्फ यौन संबंध बनाने का छल।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 69 केवल ऐसी धोखाधड़ी को दंडित करती है, जहां आरोपी का इरादा शुरू से ही यौन संबंध बनाने के लिए झूठा वादा करने का हो।
यह आदेश प्रेम और छल में स्पष्ट अंतर को उजागर करता है और बताता है कि सामाजिक और कानूनी मानदंड में आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता।
इस फैसले ने कानून की सीमा और न्याय की संवेदनशीलता दोनों को संतुलित करते हुए, भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शन स्थापित कर दिया है।


















