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रिलायंस ने रोका रूसी कच्चे तेल का आयात, EU प्रतिबंधों से पहले बड़ा फैसला

भारतीय उद्योगपति मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपनी जामनगर स्थित विश्व की सबसे बड़ी रिफाइनिंग इकाई के लिए रूसी कच्चे तेल का आयात पूरी तरह बंद कर दिया है।
रिलायंस की यह रिफाइनरी मुख्य रूप से तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का वैश्विक निर्यात करती है।

EU और US प्रतिबंधों के अनुरूप निर्णय

यूरोपीय संघ ने रूसी कच्चे तेल से बने ईंधन के आयात पर सख्त प्रतिबंध की घोषणा की है, जो 21 जनवरी 2026 से लागू होने जा रहा है।
इन नियमों का प्रभाव निर्यातक रिफाइनरियों पर पड़ेगा—जिसके चलते रिलायंस ने अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए यह बदलाव समय से पहले ही लागू कर दिया।

इसके अलावा, अमेरिका ने रूसी तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, जो अभी से प्रभावी हो चुके हैं। रिलायंस का यह कदम इन वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों के अनुरूप भी है।

कंपनी का आधिकारिक बयान

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने कहा—

“21 जनवरी 2026 से लागू होने वाले उत्पाद आयात प्रतिबंधों के अनुपालन के लिए कंपनी ने आवश्यक बदलाव तय समय से पहले पूरे कर लिए हैं।”

अमेरिका ने किया स्वागत

व्हाइट हाउस प्रेस कार्यालय ने वॉशिंगटन पोस्ट को दिए बयान में कहा—

“हम इस बदलाव का स्वागत करते हैं और अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद करते हैं।”

अमेरिका लंबे समय से भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने पर चिंता जताता रहा है। रिलायंस का यह फैसला दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव कम करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

भारत-रूस तेल व्यापार पर असर

भारत पिछले दो वर्षों में रूसी कच्चे तेल का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है। कई सरकारी और निजी रिफाइनरियां रूस से सस्ती दरों पर तेल खरीदती रही हैं।
हालांकि, निर्यात आधारित निजी रिफाइनरियों—जैसे रिलायंस—के लिए EU और US प्रतिबंधों का पालन करना अनिवार्य हो गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार,
जामनगर रिफाइनरी अब अन्य देशों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाएगी
वैश्विक ईंधन बाज़ार में भारत की भूमिका और रणनीति में बदलाव दिख सकता है
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में यह कदम एक सकारात्मक संकेत माना जाएगा

रिलायंस का रूसी कच्चा तेल आयात रोकना सिर्फ एक व्यावसायिक निर्णय नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दबावों, वैश्विक प्रतिबंधों और व्यापारिक कूटनीति के बीच लिया गया रणनीतिक कदम है।
यह आगे भारत के ऊर्जा व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

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