दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि दोनों की भूमिका अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से भिन्न” है और वे गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 43D(5) की कठोर कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि इस मामले में हर आरोपी की भूमिका को अलग-अलग परखा गया है और किसी भी तरह का सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने से जानबूझकर परहेज किया गया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री के आधार पर माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप बनते हैं, इसलिए इस स्तर पर उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पांच आरोपियों—गुलफिशा, मिरान, सलीम, शिफा और शादाब—को जमानत देने का फैसला किया है। अदालत ने कहा कि इन आरोपियों की भूमिका, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य अलग प्रकृति के हैं, जिस कारण उन्हें राहत दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि UAPA जैसे कठोर कानूनों के मामलों में ट्रायल में देरी एक गंभीर चिंता का विषय जरूर है, लेकिन सिर्फ देरी के आधार पर जमानत देना अनिवार्य नहीं हो जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामला देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा हो, तब न्यायालय को हर पहलू का संतुलन बनाकर मूल्यांकन करना होता है।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के मानदंड सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कहीं अधिक सख्त होते हैं। यदि आरोप प्रथम दृष्टया टिकाऊ और गंभीर प्रतीत होते हैं, तो आरोपी की हिरासत जारी रखी जा सकती है। वहीं, यदि आरोप कमजोर या अस्थिर लगते हैं, तो जमानत दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि UAPA जैसे विशेष कानून संसद द्वारा विशिष्ट परिस्थितियों के लिए बनाए गए हैं। धारा 43D(5) जमानत के सामान्य नियमों से अलग है, लेकिन यह न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह समाप्त नहीं करती। अदालत को यह भी देखना होता है कि लंबी हिरासत से कोई वास्तविक उद्देश्य पूरा हो रहा है या नहीं।
अपने फैसले में कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी भी की कि आतंकवादी कृत्य केवल हिंसा तक सीमित नहीं होते, बल्कि आवश्यक सेवाओं को बाधित करना और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करना भी इसके दायरे में आता है। इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कानून का शिकंजा ढीला नहीं किया जाएगा।


















