बिहार की ख़ाकी एक बार फिर शक के कटघरे में खड़ी है।
इस बार आरोप किसी सियासी विरोधी या आम फरियादी का नहीं, बल्कि सेना से रिटायर्ड इंस्पेक्टर जितेंद्र कुमार सिंह का है, जिन्होंने दो थाना प्रभारियों पर कातिलों से मिलीभगत का सनसनीख़ेज़ आरोप लगाया है।
मामला कोई नया नहीं, बल्कि बीस साल पुरानी दोहरी हत्या से जुड़ा है, जिसमें इंसाफ़ आज तक भटकता नज़र आ रहा है। यह केस भोजपुर जिले के मुफस्सिल थाना कांड संख्या 73/06 और सेशन ट्रायल 489/2006 के तहत दर्ज है। आरोप है कि एक शादी समारोह के दौरान वैजनाथ सिंह और हरेराम की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई थी।

इस मामले में हाकिम सिंह, गोपाल सिंह, कलयुग सिंह और सतयुग सिंह समेत कई आरोपी नामजद हैं। गवाहियों की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी और बहस व फ़ैसले की बारी थी, लेकिन यहीं से कहानी ने ख़ौफ़नाक मोड़ ले लिया।
पूर्व सैनिक जितेंद्र कुमार सिंह का आरोप है कि छह महीने पहले कोर्ट ने आरोपियों की ज़मानत रद्द करते हुए गिरफ्तारी का स्पष्ट आदेश दिया, इसके बावजूद आरोपी आज़ाद घूम रहे हैं। मुफस्सिल थाना पुलिस पर गंभीर आरोप हैं कि वह जानबूझकर कार्रवाई से बच रही है। थानाध्यक्ष राम कल्याण यादव पर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना का इल्ज़ाम लगाया गया है।
आरोप यहीं तक सीमित नहीं हैं। बताया जाता है कि मुख्य आरोपी हाकिम सिंह पहले भी हत्या के मामले में 20 साल की सज़ा काट चुका है, और इन आरोपियों पर दर्जनों हत्या, लूट और मारपीट के केस दर्ज हैं। पूर्व में ये लोग एक एएसपी पर फायरिंग की वारदात में भी शामिल रह चुके हैं, फिर भी आज तक कानून की पकड़ से बाहर हैं।

स्थिति यह है कि गवाहों और मृतकों के परिजनों को जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। भय के चलते पीड़ित परिवार को घर छोड़कर पलायन करना पड़ा है।
पूर्व सैनिक डीजीपी से मुलाकात, और गृह मंत्री सम्राट चौधरी को ज्ञापन सौंप चुके हैं, लेकिन जमीनी हक़ीक़त जस की तस है—
कातिल बेख़ौफ़ हैं, ख़ाकी ख़ामोश।
अब सवाल लाज़मी है—
क्या यही है सुशासन?
क्या ऐसे ही अपराधियों पर नकेल कसी जाएगी?
या फिर अदालत के फ़रमान भी थाने की देहरी पर दम तोड़ते रहेंगे?
















